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Category: अंतरराष्ट्रीय

  • Iran Israel war: जुल्फिकार के साथ खैबर की ओर, ईरान-इजरायल टकराव में खामेनेई का चेतावनी भरा संदेश

    Iran Israel war: जुल्फिकार के साथ खैबर की ओर, ईरान-इजरायल टकराव में खामेनेई का चेतावनी भरा संदेश

    Iran Israel war: ईरान और इजरायल के बीच लंबे समय से जारी तनाव अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। छठे दिन की जंग में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर जो संदेश लिखा, उसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। उन्होंने लिखा:- “महान हैदर के नाम पर, लड़ाई शुरू होती है। अली अपनी जुल्फिकार के साथ खैबर लौटते हैं।”

    Iran Israel war

    यह पोस्ट न सिर्फ एक भावनात्मक सन्देश है बल्कि इसमें कई ऐतिहासिक और धार्मिक प्रतीकों के माध्यम से युद्ध का संदेश छिपा है। ‘हैदर’, ‘अली’, ‘जुल्फिकार’ और ‘खैबर’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल इस बात का संकेत है कि यह टकराव अब केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि विचारधारात्मक और धार्मिक रूप ले चुका है।

    हैदर और अली का प्रतीकात्मक अर्थIran Israel war

    ‘हैदर’ और ‘अली’ दोनों शब्द इस्लामिक इतिहास में हजरत अली से जुड़े हैं, जिन्हें शिया समुदाय पहले इमाम और सुन्नी समुदाय चौथे खलीफा के रूप में मानता है। हजरत अली को ‘शेर’ यानी बहादुरी और न्याय का प्रतीक माना जाता है। खामेनेई का ‘हैदर’ नाम से संबोधित करना उनके द्वारा युद्ध को अली की बहादुरी और धर्म के रक्षक रूप में दिखाना है।

    जुल्फिकार: न्याय और युद्ध का हथियारIran Israel war

    ‘जुल्फिकार’ हजरत अली की दोधारी तलवार का नाम था, जो इस्लामी परंपरा में शक्ति, न्याय और विजय का प्रतीक है। खामेनेई द्वारा ‘जुल्फिकार’ शब्द का उपयोग यह स्पष्ट करता है कि ईरान अब निर्णायक कार्रवाई की मुद्रा में है और यह लड़ाई सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि धार्मिक व सांस्कृतिक पहचान की भी है।

    खैबर: इतिहास से वर्तमान तकIran Israel war

    628 ई. में लड़ी गई खैबर की लड़ाई में मुस्लिम सेना ने यहूदी कबीलों को हराया था। यह जंग इस्लामी विजय का प्रतीक मानी जाती है। आज ईरान इस ऐतिहासिक लड़ाई का जिक्र कर इजरायल को एक बार फिर वैसा ही दुश्मन बताने की कोशिश कर रहा है। Iran Israel war

    ईरान लंबे समय से इजरायल की नीतियों को फिलिस्तीन के खिलाफ अत्याचार के रूप में देखता आया है। खासकर जेरूसलम की अल-अक्सा मस्जिद की सुरक्षा को लेकर ईरान की चिंता सार्वजनिक रही है। खैबर का जिक्र कर खामेनेई ने यह स्पष्ट किया है कि अब संघर्ष को धार्मिक विमर्श में तब्दील किया जाएगा।

    धार्मिक विमर्श बनाम राजनीतिक टकरावIran Israel war

    खामेनेई की यह पोस्ट सीधे तौर पर इजरायल के खिलाफ एक धार्मिक युद्ध का संकेत देती है। जुल्फिकार और खैबर जैसे प्रतीक युद्ध में आत्मबल, विश्वास और ऐतिहासिक न्याय का प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे इजरायल और अमेरिका के खिलाफ मुस्लिम जनमानस को लामबंद करने की रणनीति भी दिखती है।

    यह टकराव अब सिर्फ मिसाइलों या सैनिक कार्रवाइयों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें धर्म, इतिहास और पहचान की भी निर्णायक भूमिका होगी। आने वाले समय में इसका असर क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक राजनीति पर गहरा पड़ सकता है।

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    सोर्स- TV9 HINDI

  • Modi Trump phone call: ट्रंप के दावे पर पीएम मोदी का करारा जवाब, “भारत ने कभी मध्यस्थता स्वीकार नहीं की, न करेगा”

    Modi Trump phone call: ट्रंप के दावे पर पीएम मोदी का करारा जवाब, “भारत ने कभी मध्यस्थता स्वीकार नहीं की, न करेगा”

    Modi Trump phone call: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हाल ही में हुई फोन बातचीत ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में स्पष्टता और दृढ़ता का परिचय दिया है। विदेश सचिव विक्रम मिसरी द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इस कॉल में पीएम मोदी ने न सिर्फ भारत की स्थिति स्पष्ट की, बल्कि ट्रंप के पुराने बयानों का भी करारा जवाब दिया।

    यह फोन कॉल उस समय हुई जब जी-7 सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं की मुलाकात प्रस्तावित थी, लेकिन ट्रंप को कनाडा से जल्दी लौटना पड़ा, जिससे यह मुलाकात नहीं हो पाई। इसके बाद ट्रंप के आग्रह पर 35 मिनट की फोन बातचीत हुई। विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने बताया कि इस बातचीत में ऑपरेशन सिंदूर और सीजफायर की परिस्थितियों पर विस्तार से चर्चा की गई।

    पीएम मोदी का सीधा और स्पष्ट रुख- Modi Trump phone call

    पीएम मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप को स्पष्ट रूप से बताया कि भारत ने पाकिस्तान के साथ संबंधों में कभी किसी बाहरी मध्यस्थता को स्वीकार नहीं किया है। भारत की नीति स्पष्ट रही है कि द्विपक्षीय मसलों को दोनों देशों के बीच आपसी संवाद के माध्यम से ही हल किया जाएगा। मोदी ने कहा कि भारत की समस्त राजनीतिक पार्टियों का इस विषय पर एकमत मत है।

    ऑपरेशन सिंदूर और सीजफायर का सच- Modi Trump phone call

    प्रधानमंत्री मोदी ने ऑपरेशन सिंदूर की घटनाओं को विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि 6-7 मई की रात को भारत ने आतंक के खिलाफ सटीक और नियंत्रित कार्रवाई की थी। यह कार्रवाई न केवल सीमित और लक्षित थी, बल्कि पूरी तरह से गैर-उकसावे वाली थी। Modi Trump phone call

    उन्होंने कहा कि भारत ने सिर्फ आतंकियों के ठिकानों को निशाना बनाया था और यह कार्रवाई पाकिस्तान के किसी नागरिक या सैन्य संस्थान को लक्ष्य बनाकर नहीं की गई थी। मोदी ने यह भी कहा कि पाकिस्तान की एक गोली का जवाब भारत ने गोले से दिया। Modi Trump phone call

    सीजफायर का असली कारण

    सीजफायर के मुद्दे पर ट्रंप कई बार यह दावा कर चुके हैं कि उन्होंने अपने व्यापारिक प्रभाव का इस्तेमाल कर भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध रोकवाया। लेकिन पीएम मोदी ने यह बात साफ कर दी कि भारत पर कोई दबाव नहीं था।

    प्रधानमंत्री ने बताया कि 9 मई की रात को अमेरिका के तत्कालीन उपराष्ट्रपति जेडी वॉन्स ने पीएम मोदी को कॉल किया और पाकिस्तान की ओर से बड़े हमले की आशंका जताई। मोदी ने उपराष्ट्रपति वॉन्स को जवाब दिया कि अगर पाकिस्तान ने ऐसा किया, तो भारत और भी बड़ा जवाब देगा। Modi Trump phone call

    भारत की जवाबी कार्रवाई और पाकिस्तान की गुहार

    9-10 मई की रात भारत ने पाकिस्तान के हमले का जोरदार जवाब दिया और पाकिस्तान की सेना को भारी नुकसान पहुंचाया। पाकिस्तान के कई सैन्य अड्डे काम करने लायक नहीं रहे। इसी के बाद पाकिस्तान ने सैन्य चैनल के जरिए भारत से सीजफायर की गुजारिश की।

    पीएम मोदी ने ट्रंप को साफ कहा कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील या किसी भी तरह की मध्यस्थता की बात उस दौरान नहीं हुई थी।

    ट्रंप को करारा जवाब

    ट्रंप अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह दावा करते रहे हैं कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच बातचीत और शांति स्थापित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन पीएम मोदी ने ट्रंप को साफ कर दिया कि भारत किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को कभी नहीं स्वीकार करेगा।

  • Iran-Israel conflict: ट्रंप का जी7 छोड़कर वॉशिंगटन लौटना, ईरान-इजरायल संघर्ष में बड़ा कदम उठाने का संकेत

    Iran-Israel conflict: ट्रंप का जी7 छोड़कर वॉशिंगटन लौटना, ईरान-इजरायल संघर्ष में बड़ा कदम उठाने का संकेत

    Iran-Israel conflict: कनाडा में आयोजित जी7 शिखर सम्मेलन को बीच में ही छोड़कर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अचानक वॉशिंगटन लौट गए हैं। उनकी इस अप्रत्याशित वापसी ने वैश्विक मंच पर हलचल मचा दी है। ट्रंप ने कनाडा से रवाना होने से पहले एक बयान में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों पर निशाना साधा और मध्य पूर्व में चल रहे ईरान-इजरायल संघर्ष को लेकर बड़ा इशारा किया।

    ट्रंप का मैक्रों पर तंज और सीजफायर से इनकार- Iran-Israel conflict

    जी7 समिट के दौरान ट्रंप ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों पर निशाना साधते हुए कहा, “पब्लिसिटी चाहने वाले मैक्रों ने गलती से कहा कि मैं सीजफायर के लिए वॉशिंगटन लौट रहा हूं। यह गलत है, मेरा मकसद इससे कहीं बड़ा है।” ट्रंप ने साफ किया कि उनकी वापसी का उद्देश्य इजरायल और ईरान के बीच युद्धविराम कराना नहीं है। उनके इस बयान ने कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। ट्रंप ने यह भी कहा कि मैक्रों “हमेशा गलत बोलते हैं,” जिससे दोनों नेताओं के बीच तल्खी साफ झलक रही है। Iran-Israel conflict

    ट्रंप की यह टिप्पणी तब आई जब मैक्रों ने दावा किया था कि ट्रंप इजरायल-ईरान युद्ध में सीजफायर के लिए प्रस्ताव लेकर आए हैं। लेकिन ट्रंप ने इसे खारिज करते हुए संकेत दिया कि उनकी प्राथमिकता कुछ और है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, “ईरान को मेरे द्वारा सुझाए गए समझौते को स्वीकार करना चाहिए था। यह मानव जीवन की बर्बादी है। ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने देंगे।”

    जी7 में इजरायल को खुला समर्थन- Iran-Israel conflict

    जी7 शिखर सम्मेलन में शामिल सभी सात देशों—अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और ब्रिटेन—ने इजरायल के पक्ष में खुलकर समर्थन जताया। नेताओं ने एक स्वर में कहा कि इजरायल को अपनी आत्मरक्षा का पूरा हक है। साथ ही, उन्होंने ईरान पर दबाव बनाया कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम को रोके। जी7 के बयान में साफ कहा गया कि ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यह वैश्विक मंच से इजरायल को मिला समर्थन ईरान के खिलाफ उसके रुख को और मजबूत कर सकता है। Iran-Israel conflict

    हालांकि, ट्रंप ने जी7 के इस संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया, जिससे अमेरिका का रुख बाकी देशों से अलग दिखाई दिया। यह कदम उनके एकतरफा फैसलों और दबाव की रणनीति को दर्शाता है, जो उनकी विदेश नीति का हिस्सा रहा है।

    ईरान-इजरायल तनाव: क्या है मौजूदा स्थिति? – Iran-Israel conflict

    पिछले कुछ दिनों से ईरान और इजरायल के बीच तनाव चरम पर है। इजरायल ने ईरान के सैन्य ठिकानों और परमाणु सुविधाओं पर हवाई हमले किए हैं, जिसके जवाब में ईरान ने भी मिसाइल और ड्रोन हमले किए। इन हमलों में सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है, और क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ रही है। ट्रंप ने पहले ही ईरान को 60 दिन का अल्टीमेटम दिया था कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम पर लगाम लगाए, नहीं तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। Iran-Israel conflict

    इजरायल ने अमेरिका से अपने सैन्य अभियानों में सीधे शामिल होने की अपील की है, खासकर उन अंडरग्राउंड परमाणु सुविधाओं को नष्ट करने के लिए, जिन्हें निशाना बनाना मुश्किल है। अमेरिका के पास ऐसे विशेष हथियार हैं, जो इन सुविधाओं को नष्ट कर सकते हैं। हालांकि, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि अभी तक अमेरिका ने इन हमलों में प्रत्यक्ष भागीदारी से इनकार किया है, लेकिन क्षेत्र में अपनी सेनाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जा रही है। Iran-Israel conflict

    अमेरिका की अगली रणनीति क्या होगी?- Iran-Israel conflict

    ट्रंप के बयानों और जी7 समिट से अचानक लौटने से यह सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका अब ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की ओर बढ़ रहा है? उनकी टिप्पणियों से साफ है कि वे सीजफायर के पक्ष में नहीं हैं। इसके बजाय, वे ईरान पर “अधिकतम दबाव” की नीति को और सख्त करने के मूड में दिख रहे हैं। ट्रंप ने पहले भी ईरान को चेतावनी दी थी कि अगर उसने अमेरिकी हितों या ठिकानों पर हमला किया, तो उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

    वहीं, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की यह रणनीति न केवल ईरान को दबाव में लाने की है, बल्कि वैश्विक मंच पर अमेरिका की ताकत को फिर से स्थापित करने की भी कोशिश है। मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव और इजरायल का खुला समर्थन इस बात का संकेत देता है कि आने वाले दिनों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।

    भारत के लिए क्या मायने? – Iran-Israel conflict

    इस पूरे घटनाक्रम का भारत पर भी असर पड़ सकता है। भारत के ईरान और इजरायल दोनों के साथ मजबूत रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं। जहां इजरायल भारत के रक्षा क्षेत्र का अहम साझेदार है, वहीं ईरान भारत को सेंट्रल एशिया के साथ व्यापार के लिए रास्ता प्रदान करता है। ऐसे में भारत को अपनी कूटनीतिक रणनीति सावधानी से तय करनी होगी ताकि वह न तो पश्चिमी देशों को नाराज करे और न ही ईरान के साथ अपने संबंधों को कमजोर करे।

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    सोर्स- AAJ TAK

  • ISRAEL IRAN WAR: इजरायली बमबारी से थर्राया तेहरान! राजधानी छोड़ रहे हजारों लोग, सड़कों पर जाम और अफरा-तफरी

    ISRAEL IRAN WAR: इजरायली बमबारी से थर्राया तेहरान! राजधानी छोड़ रहे हजारों लोग, सड़कों पर जाम और अफरा-तफरी

    ईरान की राजधानी तेहरान इस वक्त अपने सबसे डरावने दौर से गुजर रही है। इजरायली मिसाइल हमलों और हवाई बमबारी के बाद पूरे शहर में अफरा-तफरी का माहौल बन गया है। आम लोग शहर से पलायन कर रहे हैं और शहर की अधिकतर सड़कों पर भारी ट्रैफिक जाम लगा हुआ है।

    तेहरान में रह रहे नागरिकों के अनुसार, अब हर कोई अपने परिवार को सुरक्षित स्थान पर ले जाना चाहता है। खासकर उत्तर दिशा में स्थित ग्रामीण इलाकों की ओर भारी संख्या में लोग भाग रहे हैं। लेकिन बढ़ती भीड़ के कारण ये रास्ते भी बंद होने की कगार पर हैं।

    CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, लोग घबराए हुए हैं और पेट्रोल पंपों पर कई किलोमीटर लंबी कतारें देखी जा रही हैं। जर्मन प्रेस एजेंसी डीपीए के रिपोर्टर ने भी कहा कि शहर में बदहवासी का माहौल है और लोग बिना योजना के बस निकल पड़ रहे हैं।

    इजरायली वायु सेना द्वारा किए गए टारगेटेड हमलों में ईरानी वैज्ञानिकों और शीर्ष सैन्य अधिकारियों के आवासों को निशाना बनाया गया। कुछ तस्वीरों में देखा गया कि कैसे सटीक हमलों में आवासीय इमारतें ध्वस्त हो गईं। इससे आम नागरिकों में भय का माहौल और गहरा हो गया है।

    सीएनएन से बातचीत में एक शख्स ने कहा, “मैं घर नहीं छोड़ना चाहता लेकिन अपने बच्चों की जान खतरे में नहीं डाल सकता। मुझे उम्मीद है कि अमेरिका हस्तक्षेप करेगा।”

    तेहरान में हालात इतने तनावपूर्ण हो चुके हैं कि सरकार को खुद सामने आकर लोगों को भरोसा देना पड़ा है। सरकारी प्रवक्ता फतेमेह मोहजेरानी ने बताया कि मस्जिदों, स्कूलों और मेट्रो स्टेशनों को आपातकालीन शरण स्थलों के रूप में खोला गया है। मेट्रो सेवा अब 24 घंटे खुली रहेगी ताकि लोग सुरक्षित स्थानों पर पहुंच सकें।

    ईरान की राजधानी में ऐसी स्थिति पहली बार नहीं बनी है, लेकिन इस बार की बमबारी और टारगेटेड हमले शहर की असुरक्षा को उजागर कर रहे हैं। इजरायल और ईरान के बीच यह संघर्ष अब सीधे नागरिकों के जीवन को प्रभावित कर रहा है।

    सरकार और सेना द्वारा किसी बड़े पलटवार की जानकारी अभी तक सामने नहीं आई है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह हमला और तेज होता है, तो पूरे पश्चिम एशिया में अस्थिरता फैल सकती है।

    इस तनावपूर्ण स्थिति में तेहरान की सड़कों पर फंसे लोग सरकार से नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय से उम्मीद लगाए बैठे हैं कि यह युद्ध रुके और आम नागरिकों की जान बच सके।

  • Ali Khamenei Lavizan Bunker: ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई लाविजान बंकर में सुरक्षित, इजराइल के लिए हमला असंभव

    Ali Khamenei Lavizan Bunker: ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई लाविजान बंकर में सुरक्षित, इजराइल के लिए हमला असंभव

    Ali Khamenei Lavizan Bunker: ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को तेहरान के सबसे सुरक्षित लाविजान बंकर में शिफ्ट कर दिया गया है। यह कदम क्षेत्रीय तनाव और इजराइल के साथ बढ़ती सैन्य टकराव की आशंका के बीच उठाया गया है। लाविजान बंकर को ईरान का सबसे सुरक्षित ठिकाना माना जाता है, जहां से खामेनेई देश का नेतृत्व संभाल रहे हैं। इस बंकर की विशेषताएं और रणनीतिक महत्व इसे इजराइल जैसे शक्तिशाली देशों के लिए भी अभेद्य बनाते हैं। आइए, इस बंकर और इसके महत्व को विस्तार से समझते हैं।

    लाविजान बंकर: अभेद्य किला- Ali Khamenei Lavizan Bunker

    लाविजान बंकर तेहरान के उत्तर-पूर्व में, सुप्रीम लीडर के आधिकारिक आवास से लगभग 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह बंकर इतना सुरक्षित है कि इसे मिसाइल हमलों से भी बचाया जा सकता है। ईरान की सेना इसकी कड़ी निगरानी करती है, और इसे देश की सैन्य रणनीति का केंद्र माना जाता है। इस बंकर का निर्माण इस तरह किया गया है कि यह बाहरी हमलों को झेल सके। पहले भी खामेनेई ने संकट के समय इस बंकर का उपयोग किया है।

    लाविजान क्षेत्र में ही ईरान की जमीनी सेना का मुख्यालय भी मौजूद है। यहीं से युद्ध और सैन्य गतिविधियों की निगरानी होती है। ग्लोबल सिक्योरिटी ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, लाविजान में मिसाइल उत्पादन की सुविधाएं भी हैं, जो इसे रणनीतिक रूप से और भी महत्वपूर्ण बनाती हैं। अगर इस क्षेत्र पर कोई हमला होता है, तो ईरान की सैन्य शक्ति को गहरा नुकसान हो सकता है।

    न्यूक्लियर साइट का खतरा- Ali Khamenei Lavizan Bunker

    लाविजान में एक अंडरग्राउंड यूरेनियम साइट भी मौजूद है, जिसे अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने दुनिया के सबसे सुरक्षित न्यूक्लियर ठिकानों में से एक बताया है। यह साइट लाविजान बंकर के आसपास ही स्थित है। अगर इस क्षेत्र पर हमला होता है, तो न्यूक्लियर रेडिएशन का खतरा पैदा हो सकता है, जो तेहरान और आसपास के लाखों लोगों के लिए घातक साबित हो सकता है।

    https://twitter.com/TheBahubali_IND/status/1934429922715447521

    इजराइल के लिए इस क्षेत्र पर हमला करना इसलिए भी जोखिम भरा है, क्योंकि यह न केवल सैन्य नुकसान पहुंचाएगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर इजराइल की छवि को भी धूमिल कर सकता है। न्यूक्लियर रेडिएशन का खतरा युद्ध से भी बड़ी तबाही ला सकता है, जिससे इजराइल को अंतरराष्ट्रीय समुदाय में कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ सकता है।

    अली खामेनेई: ईरान की सत्ता का केंद्र- Ali Khamenei Lavizan Bunker

    86 वर्षीय अयातुल्लाह अली खामेनेई ईरान के सुप्रीम लीडर हैं और देश की सारी सत्ता उनके हाथों में केंद्रित है। हालांकि ईरान में राष्ट्रपति और कैबिनेट का गठन होता है, लेकिन सभी बड़े फैसले सुप्रीम लीडर ही लेते हैं। खामेनेई 1989 से इस पद पर हैं और इससे पहले वे ईरान के राष्ट्रपति भी रह चुके हैं। उन्हें ईरान के पहले सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खुमैनी का सबसे करीबी सहयोगी माना जाता था।

    खामेनेई का नेतृत्व ईरान की सैन्य, धार्मिक और राजनीतिक नीतियों को दिशा देता है। लाविजान बंकर से वे न केवल अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर रहे हैं, बल्कि देश की रणनीति को भी निर्देशित कर रहे हैं।

    इजराइल के लिए चुनौती- Ali Khamenei Lavizan Bunker

    लाविजान बंकर की सुरक्षा और न्यूक्लियर साइट की मौजूदगी इजराइल के लिए बड़ी चुनौती है। इस क्षेत्र पर हमला करने का मतलब है लाखों लोगों की जान को खतरे में डालना और वैश्विक स्तर पर निंदा झेलना। इसके अलावा, ईरान की सेना और मिसाइल क्षमता भी इस क्षेत्र को अभेद्य बनाती है।

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  • Israel Iran War: Fordow पर नजर, Tehran पर वार! जानिए इजरायल-ईरान संघर्ष में अमेरिका की ‘नो एंट्री’ नीति

    Israel Iran War: Fordow पर नजर, Tehran पर वार! जानिए इजरायल-ईरान संघर्ष में अमेरिका की ‘नो एंट्री’ नीति

    Israel Iran War: इजरायल और ईरान के बीच तनाव ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर हलचल मचा दी है। दोनों देशों के बीच मिसाइल हमलों की तीव्रता ने स्थिति को युद्ध के कगार पर ला खड़ा किया है। इजरायल ने ईरान के न्यूक्लियर और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है, जबकि ईरान ने जवाबी कार्रवाई में इजरायल के रिहायशी इलाकों, जैसे तेल अवीव और हाइफा, को तबाह कर दिया है। इस युद्ध ने न केवल मध्य पूर्व को, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी संकट में डाल दिया है। विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के संभावित बंद होने की आशंका ने तेल की कीमतों में भारी उछाल ला दिया है। इस लेख में हम इस युद्ध के विभिन्न पहलुओं, Fordow न्यूक्लियर प्लांट की खासियत, और इसके वैश्विक प्रभावों पर चर्चा करेंगे। Israel Iran War

    (Photo Credit – X)

    चुनिंदा ठिकानों को बना रहे हैं निशाना– Israel Iran War

    इजरायल लगातार ईरान के न्यूक्लियर फैसिलिटी, सैन्य बेस और रणनीतिक प्रतिष्ठानों को टारगेट कर रहा है। जवाब में ईरान ने इजरायली रिहायशी इलाकों को निशाना बनाकर आम जनता को नुकसान पहुंचाया है। इस युद्ध के केंद्र में ईरान का Fordow न्यूक्लियर प्लांट है, जिसे लेकर इजरायल ने अब अमेरिका से मदद मांगी है। Israel Iran War

    ईरान के मिसाइल हमले में इजराइल के 10 लोग मारे गए, 200 से ज्यादा लोग घायल हैं, 35 लापता हैं. (Photo Credit – X)

    Fordow प्लांट: ईरान की परमाणु ताकत का केंद्र– Israel Iran War

    Fordow न्यूक्लियर प्लांट ईरान के सबसे हाई-सिक्योरिटी यूरेनियम संवर्धन संयंत्रों में से एक है। यह Qom शहर से 32 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित है और पहाड़ के अंदर बना हुआ है। यह प्लांट IRGC (इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स) की निगरानी में है। इसमें लगभग 2000 सेंट्रीफ्यूज हैं, जिनमें से करीब 350 उन्नत IR-6 मॉडल के हैं जो 60% शुद्धता तक यूरेनियम को संवर्धित कर सकते हैं। यही कारण है कि इजरायल इस प्लांट को ईरान के परमाणु कार्यक्रम की रीढ़ मानता है।

    इजरायल ने मांगी अमेरिकी सैन्य सहायता– Israel Iran War

    ईरान के साथ जंग को 48 घंटे गुजर चुके हैं और इस बीच इजरायली सरकार ने अमेरिकी प्रशासन से अपील की है कि वह Fordow प्लांट पर हमले में इजरायल का साथ दे। इजरायली अधिकारियों का कहना है कि प्लांट की अंडरग्राउंड स्थिति की वजह से उनका देश अकेले इसे नष्ट नहीं कर सकता। Israel Iran War

    (Photo Credit – X)

    अमेरिकी रुख: सैन्य समर्थन से फिलहाल इंकार– Israel Iran War

    हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका फिलहाल इस युद्ध में सीधे हस्तक्षेप नहीं करेगा। व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने भी बताया है कि अमेरिका की प्राथमिकता फिलहाल मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य और राजनयिक संपत्तियों की सुरक्षा है।

    अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा, “इजरायल को फिलहाल अपने दम पर लड़ाई लड़नी होगी। हम ईरान को चेतावनी देते हैं कि वह हमारे किसी सैनिक या ठिकाने पर हमला न करे।” Israel Iran War

    जंग का विस्तार और वैश्विक खतरे

    अगर अमेरिका इजरायल का साथ देता है, तो इसके दूरगामी और खतरनाक परिणाम हो सकते हैं:

    1. मिडिल ईस्ट में व्यापक युद्ध: ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि जो भी देश इजरायल की मदद करेगा, उस पर हमला किया जाएगा। इससे सऊदी अरब, कतर, बहरीन जैसे अन्य देश भी युद्ध में घसीटे जा सकते हैं।
    2. अमेरिकी सैनिकों पर खतरा: मिडिल ईस्ट में 40,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। इन पर मिसाइल या प्रॉक्सी हमले की आशंका है।
    3. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी: यह समुद्री मार्ग विश्व के 30% तेल व्यापार का रास्ता है। युद्ध की स्थिति में ईरान यहां से गुजरने वाले जहाजों को निशाना बना सकता है, जिससे तेल कीमतें आसमान छू सकती हैं।
    4. परमाणु अप्रसार संधि से बाहर निकल सकता है ईरान: युद्ध बढ़ने की स्थिति में ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को तेज कर सकता है और अंतरराष्ट्रीय समझौतों से बाहर आ सकता है।

    इजरायल-ईरान युद्ध की वजह- Israel Iran War

    इजरायल और ईरान के बीच तनाव नया नहीं है। यह संघर्ष दशकों पुराना है, जो 1982 के लेबनान युद्ध से शुरू हुआ, जब ईरान ने लेबनानी शिया और फिलिस्तीनी समूहों का समर्थन किया था। हाल के वर्षों में, ईरान के परमाणु कार्यक्रम ने इस तनाव को और गहरा दिया है। इजरायल का मानना है कि ईरान का परमाणु हथियार बनाने का इरादा क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा है। इसीलिए, इजरायल ने “ऑपरेशन राइजिंग लॉयन” के तहत ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर सटीक हमले किए।

    क्या शांति की कोई गुंजाइश है?

    हालात बेशक गंभीर हैं, लेकिन अमेरिका ने यह संकेत भी दिया है कि वह चाहता है कि ईरान बातचीत की मेज पर लौटे। व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “हम इजरायल को रोकेंगे नहीं, लेकिन हम इस जंग का समाधान कूटनीति से चाहते हैं।”

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    सोर्स- AAJ TAK

  • IRAN ISRAEL WAR: ईरान का इजराइल पर पलटवार, Tel Aviv समेत अन्य शहरों पर दागीं 150 से अधिक मिसाइलें

    IRAN ISRAEL WAR: ईरान का इजराइल पर पलटवार, Tel Aviv समेत अन्य शहरों पर दागीं 150 से अधिक मिसाइलें

    IRAN ISRAEL WAR: इजराइल ने ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ की शुरुआत करते हुए कई सैन्य और परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया है। इजराइली सेना का दावा है कि इन हमलों में ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों को भारी नुकसान पहुंचा है और कई वैज्ञानिकों तथा सैन्य अधिकारियों की मौत हुई है। इस आक्रामक कार्रवाई के जवाब में ईरान ने भी जबरदस्त पलटवार किया है। ईरान ने अपने जवाबी हमले को ‘ट्रू प्रॉमिस थ्री’ नाम दिया है। इस ऑपरेशन के तहत ईरान ने इजराइल के कई शहरों पर एक साथ 150 से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलें दागी हैं। इन मिसाइलों से यरुशलम, तेल अवीव और हाइफा जैसे प्रमुख शहरों में धमाके हुए, जिससे पूरे देश में रेड अलर्ट जारी कर दिया गया। IRAN ISRAEL WAR

    सायरनों के बीच अफरा-तफरी- IRAN ISRAEL WAR

    ईरानी हमले के बाद इजराइल में सायरन बजने लगे, जिससे लोग जान बचाने के लिए शेल्टर की ओर भागते नजर आए। इजराइली सेना (IDF) ने सोशल मीडिया पर लिखा, “हम बार-बार ट्वीट नहीं करना चाहते, लेकिन सच्चाई यही है कि लाखों इजराइली नागरिक बंकरों में भाग रहे हैं।”

    अमेरिका की सक्रिय भागीदारी- IRAN ISRAEL WAR

    मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका इजराइल की खुलकर मदद कर रहा है। अमेरिकी अधिकारियों ने स्वीकार किया कि अमेरिका, ईरान की मिसाइलों को इंटरसेप्ट करने में इजराइली सुरक्षा एजेंसियों की मदद कर रहा है। अमेरिका ने यह भी कहा कि वह इजराइल में रह रहे लाखों अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहा है।

    ईरान का इजराइन पर बड़ा हमला (फोटो- X)

    युद्ध से हिला मिडिल ईस्ट- IRAN ISRAEL WAR

    इजराइल के रक्षा मंत्री योआव गैलेंट ने कहा कि ईरान ने नागरिक ठिकानों को निशाना बनाकर “रेड लाइन” पार कर दी है। उन्होंने ऐलान किया कि ईरान को इसके लिए बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी और इजराइल किसी भी परिस्थिति में अपने नागरिकों की रक्षा करेगा।

    ईरान ने मिसाईल के जरिए इजराइल के Tel Aviv शहर को बनाया निशाना (फोटो- X)

    वहीं, ईरान की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि यह हमला इजराइल के उकसावे और क्षेत्रीय सुरक्षा में दखल देने का जवाब है। ईरान का दावा है कि अगर हमला जारी रहता है तो वे और बड़ा जवाब देने को तैयार हैं।

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    सोर्स- ETV BHARAT

  • Middle East crisis update: इजरायल और ईरान के बीच युद्ध का खतरा बढ़ा, ट्रंप ने दी बड़ी चेतावनी

    Middle East crisis update: इजरायल और ईरान के बीच युद्ध का खतरा बढ़ा, ट्रंप ने दी बड़ी चेतावनी

    Middle East crisis update: मिडिल ईस्ट एक बार फिर दुनिया की सबसे खतरनाक जंग के मुहाने पर खड़ा है। इस क्षेत्र की अस्थिरता ने वैश्विक राजनीति को हिला कर रख दिया है। इजरायल और ईरान के बीच तनाव इस कदर बढ़ गया है कि दोनों देश युद्ध की कगार पर पहुंच चुके हैं। इस बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी ने इस तनाव में एक नया मोड़ जोड़ दिया है। Middle East crisis update

    ट्रंप का खुला संदेश: “अब भी वक्त है, बातचीत की टेबल पर लौटे ईरान”

    डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को सख्त लहजे में चेताया है। उन्होंने कहा, “अब भी देर नहीं हुई है। ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम पर पुनर्विचार कर वार्ता की मेज पर लौटना चाहिए।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका को पहले से इन हमलों की जानकारी थी और उन्होंने ईरान को “शर्म और मौत” से बचाने की पूरी कोशिश की। Middle East crisis update

    ट्रंप ने कहा कि उन्होंने दो महीने पहले ईरान को 60 दिनों का अल्टीमेटम दिया था, लेकिन 61वें दिन तक भी ईरान ने कोई सकारात्मक जवाब नहीं दिया। उन्होंने यह भी कहा कि शायद ईरान के पास अब भी “सेकंड चांस” है, लेकिन यह आखिरी मौका हो सकता है। Middle East crisis update

    इजरायल का ऑपरेशन ‘राइजिंग लॉयन’ और अमेरिका की सैन्य भूमिका

    इजरायल ने ‘ऑपरेशन राइजिंग लॉयन’ की घोषणा करते हुए साफ कर दिया है कि जब तक ईरान का परमाणु खतरा खत्म नहीं होता, यह सैन्य अभियान जारी रहेगा। इस ऑपरेशन के तहत इजरायल ने ईरान के कई परमाणु और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है।

    Middle East crisis update
    इजराइल के Tel Aviv शहर की तस्वीरें (फोटो- सोशल मीडिया)

    इस बीच अमेरिका ने खुलकर इजरायल का साथ दिया है। अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठान मिसाइल सुरक्षा में सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं। अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ईरान से दागी जा रही मिसाइलों को अमेरिका रोकने में मदद कर रहा है।

    इस स्थिति में इजरायल में रेड अलर्ट जारी कर दिया गया है और नागरिकों को बंकरों में रहने के निर्देश दिए गए हैं।

    ईरान का जवाबी हमला और बढ़ती बैलिस्टिक तैयारी

    ईरान ने इजरायल की कार्रवाई को “युद्ध की घोषणा” बताया है और जवाबी हमले की चेतावनी दी है। ईरानी रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, ईरान अब अपनी बैलिस्टिक मिसाइल प्रणाली को और उन्नत करने में लगा है। साथ ही इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को पूर्ण युद्ध की तैयारी के लिए अलर्ट पर रखा गया है।

    Middle East crisis update

    ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई ने कहा, “हम जवाब देंगे और वह भी ऐसा कि दुनिया देखेगी कि ईरान की ताकत क्या है।”

    क्या है अमेरिका-ईरान परमाणु समझौता (JCPOA)?

    अमेरिका और ईरान के बीच हुआ 2015 का परमाणु समझौता, जिसे जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) कहा जाता है, का मुख्य उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करना था। इसके बदले में ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को हटाया गया था।

    लेकिन 2018 में, ट्रंप प्रशासन ने इस समझौते से अमेरिका को बाहर निकाल लिया। इस फैसले के बाद ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर फिर से तेजी से काम करना शुरू किया। अब ट्रंप दोबारा इस डील को नए स्वरूप में करना चाहते हैं, लेकिन ईरान की सर्वोच्च सत्ता फिलहाल इसके लिए तैयार नहीं है।

    मिडिल ईस्ट में शांति की राह कठिन

    मिडिल ईस्ट की वर्तमान स्थिति बेहद नाजुक है। न सिर्फ इजरायल और ईरान, बल्कि लेबनान की हिजबुल्लाह और सीरिया की स्थिति भी इस जंग से प्रभावित हो सकती है। ईरान के सहयोगी गुट सक्रिय हो सकते हैं, जिससे पूरा क्षेत्र युद्ध की चपेट में आ सकता है। संयुक्त राष्ट्र ने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है, लेकिन अब तक कोई प्रभावी समाधान सामने नहीं आया है।

    भविष्य की संभावनाएं

    वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, मध्य पूर्व में स्थिरता की राह मुश्किल लग रही है। यदि ईरान और इजरायल के बीच युद्ध छिड़ता है, तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था, खासकर तेल की कीमतों पर पड़ सकता है। मध्य पूर्व से तेल आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में वैश्विक बाजार में उथल-पुथल मच सकती है।

    दूसरी ओर, यदि अमेरिका और ईरान के बीच कोई नया समझौता हो पाता है, तो यह क्षेत्र में तनाव को कम करने में मदद कर सकता है। हालांकि, वर्तमान में दोनों पक्षों के बीच विश्वास की कमी साफ दिखाई देती है। ईरान का कहना है कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम को नहीं रोकेगा, जबकि इजरायल और अमेरिका इसे रोकने के लिए हरसंभव कदम उठाने को तैयार हैं।

    सोर्स- AAJ TAK

  • Pak Afghan Border Conflict: बरमाचा बॉर्डर पर पाक और अफगान सेना फिर आमने-सामने, टैंकों से दागे जा रहे गोले

    Pak Afghan Border Conflict: बरमाचा बॉर्डर पर पाक और अफगान सेना फिर आमने-सामने, टैंकों से दागे जा रहे गोले

    नई दिल्ली: पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सेनाओं के बीच एक बार फिर हिंसक झड़प हुई। यह झड़प अफगानिस्तान के (Pak Afghan Border Conflict) बरमाचा सीमा क्षेत्र में हुई, जो पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के समानांतर स्थित है। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, यह विवाद सीमा पर नई सैन्य चौकियों के निर्माण को लेकर भड़का।

    बरमाचा में गोलीबारी: क्या है पूरा मामला?- Pak Afghan Border Conflict

    सुबह शुरू हुई गोलीबारी कुछ समय के लिए थम गई थी, लेकिन दोपहर बाद स्थिति फिर बिगड़ गई। पाकिस्तान स्टैंडर्ड टाइम के अनुसार, दोपहर 4:30 बजे के बाद दोनों पक्षों ने फिर से भारी गोलीबारी शुरू कर दी। अफगानिस्तान के हेलमंद प्रांत के अंतरिम प्रशासन ने भी इस झड़प की पुष्टि की। सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तानी सेना ने टैंक तैनात किए और अफगान सीमा पर बनी चौकियों को भारी तोपखाने से निशाना बनाया।

    https://twitter.com/HindusVoice_/status/1928026183184027658

    यह क्षेत्र पहले भी कई बार हिंसक झड़पों का गवाह रहा है। बरमाचा, जो अफगानिस्तान के हेलमंद प्रांत का हिस्सा है, रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। यह इलाका डूरंड लाइन के पास स्थित है, जो दोनों देशों के बीच सीमा को चिह्नित करती है। डूरंड लाइन को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से विवाद चला आ रहा है, और सीमा पर चौकियों का निर्माण इस तनाव को और बढ़ाता है।

    TTP और अफगान तालिबान की भूमिका- Pak Afghan Border Conflict

    पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच संबंध अब कट्टर दुश्मनी में बदल चुके हैं। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP), जो अफगान तालिबान का समर्थक माना जाता है, पाकिस्तान के खिलाफ लगातार हमले कर रहा है। TTP ने हाल के वर्षों में पाकिस्तान की सैन्य चौकियों पर कब्जा करने की कोशिशें तेज कर दी हैं।

    लगभग पांच महीने पहले, खैबर पख्तूनख्वा के बाजौर जिले के सालारजई क्षेत्र में TTP ने एक सैन्य बेस पर कब्जा कर लिया था और वहां अपना झंडा फहराया था। इसके बाद, 28 दिसंबर 2024 को अफगान तालिबान और TTP ने मिलकर पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों पर हमला किया। इस हमले में 19 पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने की खबर आई, जिसने पाकिस्तान सरकार को हिलाकर रख दिया।

    TTP की बढ़ती गतिविधियां और अफगान तालिबान का समर्थन पाकिस्तान के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। यह आतंकी संगठन न केवल पाकिस्तानी सेना की चौकियों को निशाना बना रहा है, बल्कि सीमा पर अस्थिरता को भी बढ़ा रहा है।

    सीमा पर तनाव के कारण- Pak Afghan Border Conflict

    पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव का प्रमुख कारण डूरंड लाइन पर सीमा बाड़ और चौकियों का निर्माण है। पाकिस्तान ने 2005 में इस सीमा पर 2,611 किलोमीटर लंबी बाड़ लगाने की योजना बनाई थी, जिसका उद्देश्य आतंकियों और तस्करों की घुसपैठ को रोकना था। हालांकि, अफगानिस्तान ने इस बाड़ को कभी स्वीकार नहीं किया और इसे अपनी संप्रभुता पर हमला माना।

    हाल के वर्षों में, दोनों देशों के बीच सीमा पर कई बार गोलीबारी और हिंसक झड़पें हो चुकी हैं। साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल (SATP) के आंकड़ों के अनुसार, 2007 से अब तक कम से कम 21 ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनमें 56 लोग मारे गए हैं। इनमें से अधिकांश पाकिस्तानी सैनिक और नागरिक थे।

    वर्तमान स्थिति और प्रभाव- Pak Afghan Border Conflict

    बरमाचा में गुरुवार की झड़प ने दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया है। हेलमंद प्रांत के स्थानीय निवासियों ने बताया कि गोलीबारी के कारण कई परिवार अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर गए। दूसरी ओर, पाकिस्तान ने अपनी सीमा पर सैन्य उपस्थिति को और मजबूत कर लिया है।

    इस संघर्ष का असर क्षेत्रीय व्यापार पर भी पड़ रहा है। टोरखम और चमन जैसे प्रमुख सीमा क्रॉसिंग पॉइंट्स पहले ही कई बार बंद हो चुके हैं, जिससे अफगानिस्तान में खाद्य और आवश्यक सामग्री की आपूर्ति प्रभावित हुई है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, अफगानिस्तान में लाखों लोग भुखमरी के कगार पर हैं, और सीमा बंद होने से यह संकट और गहरा सकता है।
    अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता

    अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस बढ़ते तनाव पर चिंता जताई है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने दोनों देशों से सैन्य संयम बरतने की अपील की है। अफगानिस्तान के विदेश मंत्रालय ने भी एक बयान जारी कर क्षेत्र में शांति और स्थिरता की वकालत की।

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    सोर्स- AAJTAK

  • iPhone Price Hike: ट्रंप की चेतावनी; अमेरिका में न बने iPhone तो Apple को 25% टैरिफ देना होगा

    iPhone Price Hike: ट्रंप की चेतावनी; अमेरिका में न बने iPhone तो Apple को 25% टैरिफ देना होगा

    नई दिल्ली: हाल के दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टेक्नोलॉजी दिग्गज ऐपल (iPhone Price Hike) को एक बार फिर निशाने पर लिया है. ट्रंप ने ऐपल पर 25% टैरिफ लगाने की धमकी दी है, अगर कंपनी अमेरिका में बिकने वाले iPhone का निर्माण अमेरिका में नहीं करती. यह धमकी ऐपल के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर सकती है, क्योंकि कंपनी पहले ही अपनी मैन्युफैक्चरिंग को चीन से भारत और अन्य देशों में शिफ्ट करने की प्रक्रिया में है. इस लेख में हम इस मुद्दे की गहराई से पड़ताल करेंगे और समझेंगे कि ट्रंप की इस नीति का ऐपल और iPhone यूजर्स पर क्या प्रभाव पड़ सकता है.

    ट्रंप का Truth Social पर बयान- iPhone Price Hike

    डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर एक पोस्ट में ऐपल के CEO टिम कुक को साफ शब्दों में चेतावनी दी. उन्होंने लिखा, “मैंने टिम कुक को पहले ही बता दिया है कि अमेरिका में बिकने वाले iPhone को अमेरिका में ही बनाना होगा, न कि भारत या किसी अन्य देश में. अगर ऐसा नहीं होता, तो ऐपल को कम से कम 25% टैरिफ का सामना करना पड़ेगा.” यह बयान न केवल ऐपल के लिए बल्कि पूरी टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा संदेश है. ट्रंप की यह नीति उनकी ‘मेक इन अमेरिका’ नीति का हिस्सा मानी जा रही है, जिसका मकसद अमेरिका में रोजगार और उत्पादन को बढ़ावा देना है.iPhone Price Hike

    ऐपल की मैन्युफैक्चरिंग रणनीति- iPhone Price Hike

    पिछले कुछ सालों में ऐपल ने अपनी मैन्युफैक्चरिंग को चीन से बाहर निकालने की रणनीति पर काम शुरू किया था. इसका कारण था अमेरिका और चीन के बीच बढ़ता व्यापारिक तनाव और लागत में कमी लाने की जरूरत. भारत इस रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है. ऐपल ने भारत में फॉक्सकॉन और पेगाट्रॉन जैसी कंपनियों के साथ साझेदारी कर iPhone के कई मॉडल्स का उत्पादन शुरू किया है. भारत में निर्मित iPhone न केवल स्थानीय बाजार के लिए हैं, बल्कि इन्हें निर्यात भी किया जा रहा है.

    हालांकि, ट्रंप की नई धमकी ने ऐपल की इस रणनीति पर सवालिया निशान लगा दिया है. अगर ऐपल को अमेरिका में iPhone का निर्माण करना पड़ेगा, तो कंपनी को भारी निवेश और नए मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स की जरूरत होगी. इससे न केवल लागत बढ़ेगी, बल्कि कंपनी की सप्लाई चेन में भी बड़ा बदलाव करना पड़ेगा.iPhone Price Hike

    iPhone की कीमतों पर असर

    ट्रंप के इस टैरिफ प्रस्ताव का सबसे बड़ा प्रभाव iPhone की कीमतों पर पड़ सकता है. अगर ऐपल को 25% टैरिफ देना पड़ा, तो कंपनी के पास दो विकल्प होंगे: या तो वह इस अतिरिक्त लागत को खुद वहन करेगी, जिससे उसका मुनाफा कम होगा, या फिर वह इस लागत को ग्राहकों पर डालेगी, जिससे iPhone की कीमतें बढ़ जाएंगी.iPhone Price Hike

    ऐपल के प्रीमियम स्मार्टफोन्स पहले से ही महंगे हैं, और कीमतों में और इजाफा होने से अमेरिकी बाजार में इसकी बिक्री पर असर पड़ सकता है. उदाहरण के लिए, अगर iPhone 16 की कीमत $799 से शुरू होती है, तो 25% टैरिफ के बाद इसकी कीमत $1000 के करीब पहुंच सकती है. इससे न केवल आम ग्राहकों को नुकसान होगा, बल्कि ऐपल की प्रतिस्पर्धा पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि सैमसंग और गूगल जैसे प्रतिद्वंद्वी ब्रांड्स सस्ते विकल्प पेश कर सकते हैं.

    भारत और चीन पर ट्रंप का रुख- iPhone Price Hike

    यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने ऐपल को भारत में मैन्युफैक्चरिंग न करने की सलाह दी है. हाल ही में दोहा में एक बिजनेस मीटिंग के दौरान ट्रंप ने कहा था कि उन्होंने टिम कुक से भारत में iPhone बनाने से मना किया है. उनका मानना है कि ऐपल को अमेरिका में निवेश करना चाहिए ताकि स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदा हो.

    पिछले कुछ महीनों में जब ट्रंप ने चीन और भारत पर अलग-अलग टैरिफ लगाने की घोषणा की थी, तब ऐपल ने जल्दबाजी में भारत और चीन में बने iPhone को हवाई जहाज के जरिए अमेरिका भेजा था. उस समय ट्रंप ने टैरिफ लागू करने की तारीख को आगे बढ़ा दिया था, जिससे ऐपल को कुछ राहत मिली थी. लेकिन अब ट्रंप का नया बयान इस बात का संकेत है कि वह अपनी नीति पर सख्ती से अमल करने के मूड में हैं.

    ऐपल के लिए चुनौतियां

    ऐपल के सामने कई चुनौतियां हैं. पहली चुनौती है अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग शुरू करने की लागत. अमेरिका में श्रम लागत और बुनियादी ढांचे की लागत भारत और चीन की तुलना में काफी अधिक है. दूसरी चुनौती है सप्लाई चेन का पुनर्गठन. ऐपल की सप्लाई चेन कई देशों में फैली हुई है, और इसे पूरी तरह अमेरिका में शिफ्ट करना आसान नहीं होगा. तीसरी चुनौती है बाजार में प्रतिस्पर्धा. अगर iPhone की कीमतें बढ़ती हैं, तो ग्राहक अन्य ब्रांड्स की ओर रुख कर सकते हैं.

    इसके अलावा, भारत में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए ऐपल ने भारत सरकार के साथ कई समझौते किए हैं. भारत में ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत ऐपल को कई छूट और सुविधाएं मिल रही हैं. अगर ऐपल भारत से अपनी मैन्युफैक्चरिंग को कम करता है, तो इससे भारत में रोजगार और निवेश पर भी असर पड़ सकता है.

    भविष्य की संभावनाएं

    ऐपल के लिए यह एक जटिल स्थिति है. कंपनी को ट्रंप की नीतियों, ग्राहकों की अपेक्षाओं और अपनी व्यावसायिक रणनीति के बीच संतुलन बनाना होगा. एक संभावना यह है कि ऐपल अमेरिका में कुछ मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स शुरू करे, लेकिन पूरी तरह से अपनी सप्लाई चेन को अमेरिका में शिफ्ट करना व्यावहारिक नहीं होगा. दूसरी संभावना यह है कि ऐपल टैरिफ की लागत को अपने मुनाफे से वहन करे, लेकिन इससे कंपनी की वित्तीय स्थिति पर असर पड़ सकता है.

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    सोर्स- ETV BHARAT