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  • BRITISH F-35 FIGHTER PLANE: केरल में फंसा 9 अरब का ब्रिटिश स्टील्थ फाइटर F-35, उड़ान के लिए पहुंची इंजीनियरों की 40 सदस्यीय टीम

    BRITISH F-35 FIGHTER PLANE: केरल में फंसा 9 अरब का ब्रिटिश स्टील्थ फाइटर F-35, उड़ान के लिए पहुंची इंजीनियरों की 40 सदस्यीय टीम

    BRITISH F-35 FIGHTER PLANE: केरल के तिरुवनंतपुरम एयरपोर्ट पर ब्रिटिश नेवी का अत्याधुनिक स्टील्थ फाइटर जेट F-35 बी लाइटनिंग II तकनीकी खराबी के चलते 14 जून से खड़ा है। यह जेट ब्रिटिश नेवी के विमानवाहक पोत HMS Prince of Wales का हिस्सा है, जो वर्तमान में केरल तट से 100 समुद्री मील की दूरी पर तैनात है। BRITISH F-35 FIGHTER PLANE

    बताया जा रहा है कि इस विमान में हाइड्रोलिक सिस्टम की गंभीर खराबी आ गई है, जिसके कारण यह उड़ान नहीं भर पा रहा है। अब ब्रिटेन से एक टो वाहन और 40 इंजीनियरों की विशेषज्ञ टीम भारत भेजी गई है, जो इस हाई-टेक वार जेट की मरम्मत करेगी।

    ✈️ कैसे हुई आपात लैंडिंग?– BRITISH F-35 FIGHTER PLANE

    14 जून को ईंधन की कमी और खराब मौसम के चलते इस फाइटर जेट को तिरुवनंतपुरम इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर आपात लैंडिंग करानी पड़ी। भारतीय वायुसेना ने सुरक्षित लैंडिंग, ईंधन और तकनीकी सहायता मुहैया कराई। लेकिन हाइड्रोलिक फेल्योर के चलते विमान उड़ान नहीं भर सका। BRITISH F-35 FIGHTER PLANE

    🛠️ ब्रिटेन से मरम्मत टीम रवाना– BRITISH F-35 FIGHTER PLANE

    अब ब्रिटिश इंजीनियरों की 40 सदस्यीय टीम विशेष टो वाहन के साथ केरल के लिए रवाना हो चुकी है। एयर इंडिया के MRO (Maintenance, Repair & Overhaul) हैंगर में इस विमान की मरम्मत की जाएगी। ब्रिटिश उच्चायोग ने बताया कि भारतीय अधिकारियों का सहयोग अभूतपूर्व रहा है। BRITISH F-35 FIGHTER PLANE

    🛑 हैंगर में ले जाने से पायलट की अनिच्छा– BRITISH F-35 FIGHTER PLANE

    इस मामले में एक और रोचक तथ्य सामने आया है कि F-35 के पायलट पहले इसे हैंगर में ले जाने को तैयार नहीं थे। कयास लगाए जा रहे हैं कि ब्रिटिश पक्ष यह नहीं चाहता कि भारतीय इंजीनियर इस एडवांस जेट की तकनीकी जानकारी देख सकें।

    💸 पार्किंग चार्ज भी लग सकता है!

    रिपोर्ट्स के अनुसार, तय समय से अधिक एयरपोर्ट पर खड़े रहने के कारण इस F-35 विमान पर पार्किंग शुल्क भी लग सकता है। हालांकि, यह चार्ज कितनी राशि का होगा, इस पर अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

    🇮🇳 भारत-ब्रिटेन सामरिक संबंधों में गहराई

    यह घटना भारत और ब्रिटेन के बीच रणनीतिक सहयोग का भी उदाहरण बन गई है, जिसमें भारत ने आपात स्थिति में एक मित्र राष्ट्र की रक्षा संपत्ति को न केवल सुरक्षित लैंडिंग दी बल्कि 24 घंटे सुरक्षा भी उपलब्ध कराई। CISF के जवान लगातार विमान की निगरानी कर रहे हैं।

    SOURCE- NDTV

  • Rajnath Singh China Visit: गलवान ना दोहराया जाए; चीन से बोले राजनाथ, चार सूत्रीय योजना से रखी भरोसे की नींव

    Rajnath Singh China Visit: गलवान ना दोहराया जाए; चीन से बोले राजनाथ, चार सूत्रीय योजना से रखी भरोसे की नींव

    Rajnath Singh China Visit: भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 25-27 जून 2025 को चीन के किंगदाओ शहर में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की रक्षा मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने अपने चीनी समकक्ष एडमिरल डोंग जून के साथ द्विपक्षीय वार्ता में भारत-चीन संबंधों को मजबूत करने और सीमा पर शांति स्थापित करने के लिए एक चार सूत्री फॉर्मूला पेश किया। साथ ही, उन्होंने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का मुद्दा उठाकर भारत के जीरो-टॉलरेंस नीति को स्पष्ट किया। इस लेख में हम इस बैठक, चार सूत्री फॉर्मूले, 2024 के डिसएंगेजमेंट प्लान और गलवान घाटी संघर्ष की पृष्ठभूमि पर विस्तार से चर्चा करेंगे। Rajnath Singh China Visit

    SCO बैठक: एक महत्वपूर्ण मंच- Rajnath Singh China Visit

    शंघाई सहयोग संगठन (SCO) एक क्षेत्रीय संगठन है, जिसमें भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, ईरान और बेलारूस जैसे देश शामिल हैं। 2001 में स्थापित यह संगठन क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई पर केंद्रित है। 2025 में चीन की अध्यक्षता में यह बैठक किंगदाओ में आयोजित हुई, जिसमें भारत ने न केवल क्षेत्रीय स्थिरता पर अपने विचार रखे बल्कि आतंकवाद और सीमा विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी खुलकर बात की। Rajnath Singh China Visit

    राजनाथ सिंह ने इस मंच का उपयोग न केवल भारत-चीन संबंधों को बेहतर करने के लिए किया बल्कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को वैश्विक मंच पर उजागर करने का भी मौका लिया। उनकी यह यात्रा 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के बाद भारत और चीन के बीच तनाव कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम थी।

    चार सूत्री फॉर्मूला: भारत की रणनीति- Rajnath Singh China Visit

    राजनाथ सिंह ने चीनी रक्षा मंत्री एडमिरल डोंग जून के साथ अपनी बैठक में एक चार सूत्री फॉर्मूला प्रस्तुत किया, जिसका उद्देश्य भारत-चीन सीमा पर स्थायी शांति और द्विपक्षीय संबंधों में सुधार लाना है। यह फॉर्मूला निम्नलिखित बिंदुओं पर आधारित है:

    1. 2024 के डिसएंगेजमेंट प्लान का पालन: भारत और चीन ने अक्टूबर 2024 में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर पेट्रोलिंग व्यवस्था को लेकर एक समझौता किया था। इस समझौते का उद्देश्य पूर्वी लद्दाख के डेमचोक और देपसांग जैसे क्षेत्रों में सैन्य गतिरोध को समाप्त करना था। राजनाथ सिंह ने इस प्लान के सख्ती से पालन पर जोर दिया, ताकि दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली हो।
    2. तनाव कम करने के लिए निरंतर प्रयास: सीमा पर तनाव को कम करने के लिए दोनों देशों को लगातार संवाद बनाए रखना होगा। यह बिंदु सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर नियमित बातचीत की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
    3. सीमांकन और परिसीमन को गति देना: भारत ने सीमा पर स्पष्ट सीमांकन (Demarcation) और परिसीमन (Delimitation) के लक्ष्य को जल्द से जल्द प्राप्त करने की वकालत की। इससे LAC पर विवाद की संभावनाएं कम होंगी और भविष्य में गलवान जैसी घटनाएं टाली जा सकेंगी।
    4. विशेष प्रतिनिधि प्रणाली का उपयोग: मतभेदों को सुलझाने और संबंधों को बेहतर बनाने के लिए मौजूदा विशेष प्रतिनिधि स्तर की प्रणाली का उपयोग करने का प्रस्ताव रखा गया। यह प्रणाली भारत और चीन के बीच लंबे समय से चली आ रही है और इसका उपयोग दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली के लिए किया जा सकता है।

    इस फॉर्मूले का प्रस्ताव भारत की उस नीति को दर्शाता है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से कोई समझौता किए बिना पड़ोसी देशों के साथ शांति और सहयोग को प्राथमिकता दी जाती है। Rajnath Singh China Visit

    2024 का डिसएंगेजमेंट प्लान: पृष्ठभूमि और महत्व- Rajnath Singh China Visit

    2024 का डिसएंगेजमेंट प्लान भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में LAC पर तनाव कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस समझौते के तहत दोनों देशों ने डेमचोक और देपसांग जैसे क्षेत्रों में सैनिकों की वापसी और पेट्रोलिंग व्यवस्था को सामान्य करने पर सहमति जताई। यह समझौता 21 अक्टूबर 2024 को अंतिम रूप से लागू हुआ, जिसके बाद दोनों देशों के बीच सैन्य गतिरोध प्रभावी रूप से समाप्त हो गया। Rajnath Singh China Visit

    इस प्लान का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह गलवान घाटी संघर्ष के बाद भारत और चीन के बीच पहला ठोस कदम था, जिसने दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली की प्रक्रिया शुरू की। राजनाथ सिंह ने अपनी बैठक में इस बात पर जोर दिया कि इस प्लान का पालन न केवल सीमा पर शांति सुनिश्चित करेगा बल्कि दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक सहयोग की नींव भी रखेगा।

    गलवान घाटी संघर्ष: एक तनावपूर्ण इतिहास- Rajnath Singh China Visit

    2020 में भारत और चीन के बीच संबंधों में उस समय गहरा तनाव आया, जब मई 2020 में पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग झील क्षेत्र में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई। यह तनाव 15 जून 2020 को गलवान घाटी में और बढ़ गया, जब दोनों देशों के सैनिकों के बीच खूनी संघर्ष हुआ। इस घटना में भारतीय सेना के 20 जवान शहीद हो गए, जबकि चीन ने अपने नुकसान की जानकारी साझा नहीं की। हालांकि, कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में दावा किया गया कि चीन को भी भारी नुकसान हुआ था।

    गलवान संघर्ष ने भारत-चीन संबंधों को चरम तनाव की स्थिति में ला दिया। इसके बाद दोनों देशों ने सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर कई दौर की वार्ता की, जिसके परिणामस्वरूप फरवरी 2021 में तनाव कम करने की प्रक्रिया शुरू हुई। अक्टूबर 2024 तक दोनों देशों ने डिसएंगेजमेंट प्लान को अंतिम रूप दिया, जो दोनों देशों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम था। Rajnath Singh China Visit

    आतंकवाद पर भारत का कड़ा रुख

    राजनाथ सिंह ने SCO बैठक में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का मुद्दा जोरदार तरीके से उठाया। उन्होंने 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जिक्र किया, जिसमें 26 लोग मारे गए थे। इस हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की शाखा द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने ली थी। Rajnath Singh China Visit

    रक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत आतंकवाद के खिलाफ जीरो-टॉलरेंस की नीति अपनाता है और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसी कार्रवाइयों के जरिए सीमा पार आतंकवाद का मुंहतोड़ जवाब देगा। ऑपरेशन सिंदूर, जिसे 7 मई 2025 को अंजाम दिया गया, आतंकवादी ढांचे को नष्ट करने और भारत की आत्मरक्षा की नीति का हिस्सा था।

    SCO संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर से इनकार

    SCO बैठक में एक महत्वपूर्ण घटना तब हुई, जब राजनाथ सिंह ने संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। इस बयान में पहलगाम आतंकी हमले का जिक्र नहीं था, जबकि बलूचिस्तान का उल्लेख कर भारत पर अप्रत्यक्ष रूप से अशांति फैलाने का आरोप लगाया गया था। भारत ने इसे आतंकवाद के मुद्दे को कमजोर करने की साजिश माना और दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया।

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस निर्णय का समर्थन करते हुए कहा कि भारत आतंकवाद के खिलाफ अपने दृढ़ रुख पर कायम है और किसी भी ऐसे दस्तावेज को स्वीकार नहीं करेगा जो इस रुख को कमजोर करता हो।

    कैलाश मानसरोवर यात्रा का पुनरारंभ

    बैठक के दौरान राजनाथ सिंह ने कैलाश मानसरोवर यात्रा के छह साल बाद फिर से शुरू होने पर खुशी जताई। यह यात्रा 2020 में कोविड-19 महामारी और गलवान संघर्ष के कारण निलंबित कर दी गई थी। इस तीर्थयात्रा का हिंदू, जैन और बौद्ध समुदायों के लिए विशेष धार्मिक महत्व है। इसका पुनरारंभ दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने का एक सकारात्मक संकेत है।

    https://nationnowsamachar.com/uttar-pradesh/lucknow/mayawati-on-shahuji-maharaj-tribute-shahuji-name-controversy-reservation-rights/

    मधुबनी पेंटिंग: सांस्कृतिक कूटनीति

    बैठक के अंत में राजनाथ सिंह ने एडमिरल डोंग जून को बिहार की पारंपरिक मधुबनी पेंटिंग भेंट की। यह पेंटिंग मिथिला कला के लिए जानी जाती है, जिसमें चमकीले रंगों और जटिल पैटर्न का उपयोग होता है। इस उपहार के जरिए भारत ने सांस्कृतिक कूटनीति को बढ़ावा देने की कोशिश की, जो दोनों देशों के बीच सकारात्मक संवाद का प्रतीक है।

    राजनाथ सिंह की चीन यात्रा और SCO बैठक में उनकी सक्रिय भागीदारी ने भारत की कूटनीतिक और रणनीतिक ताकत को दर्शाया। चार सूत्री फॉर्मूले के जरिए भारत ने न केवल सीमा विवाद सुलझाने की दिशा में ठोस कदम उठाए बल्कि आतंकवाद के खिलाफ अपनी जीरो-टॉलरेंस नीति को भी मजबूती से रखा। गलवान घाटी संघर्ष के बाद तनावपूर्ण रहे भारत-चीन संबंधों में यह बैठक एक नई शुरुआत की उम्मीद जगाती है। साथ ही, कैलाश मानसरोवर यात्रा का पुनरारंभ और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे कदम दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली की दिशा में महत्वपूर्ण हैं।

    SOURCE- TIMES OF INDIA

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  • Mayawati on Shahuji Maharaj: छत्रपति शाहूजी महाराज की जयंती पर मायावती ने अर्पित की श्रद्धांजलि, मेडिकल यूनिवर्सिटी का नाम बदलने की मांग

    Mayawati on Shahuji Maharaj: छत्रपति शाहूजी महाराज की जयंती पर मायावती ने अर्पित की श्रद्धांजलि, मेडिकल यूनिवर्सिटी का नाम बदलने की मांग

    Mayawati on Shahuji Maharaj: लखनऊ (उत्तर प्रदेश): बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष मायावती ने गुरुवार को राजर्षि छत्रपति शाहू जी महाराज की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यूपी सरकार से चट्रपति शाहू जी महाराज मेडिकल यूनिवर्सिटी का नाम बहाल करने की मांग दोहराई। उन्होंने कहा कि यह यूनिवर्सिटी सपा सरकार के कार्यकाल में राजनीतिक दुर्भावना से King George Medical University नाम से पुनः नामित की गई थी, जो समाज के पिछड़े और दलित वर्गों के सम्मान के खिलाफ है।

    मायावती ने कहा कि शाहूजी महाराज ने भारत में आरक्षण की नींव रखी थी, और उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। “वे इतिहास में अमर हैं क्योंकि उन्होंने पहली बार दलितों को नौकरियों में आरक्षण देकर सामाजिक न्याय की बुनियाद रखी।” Mayawati on Shahuji Maharaj

    “दलितों को फिर से बनाया जा रहा मजबूर”

    अपने सोशल मीडिया पोस्ट में मायावती ने दावा किया कि आज भी देश में दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि बहुजन समाज पार्टी की सरकार न होने और बहुसंख्यक वर्ग के हाथों सत्ता में आने से इन्हें फिर से मजबूर और बेबस बना दिया गया है।

    मायावती ने यह भी कहा कि ऐसे समय में राजर्षि शाहू जी महाराज की विचारधारा को याद रखना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है

    “हमने शाहूजी के नाम पर जिला बनाया, मूर्तियां स्थापित कीं”

    मायावती ने अपने कार्यकाल की उपलब्धियों को गिनाते हुए कहा कि बसपा सरकार ने शाहू जी महाराज के सम्मान में नया जिला, संस्थान और भव्य प्रतिमाएं स्थापित की थीं। साथ ही लखनऊ में मेडिकल यूनिवर्सिटी की स्थापना कर उसे उन्हीं के नाम पर जल्द संचालन में लाया गया था।

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    “सपा सरकार ने जानबूझकर नाम बदलवाया”

    मायावती ने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी की सरकार ने जानबूझकर दलित-विरोधी रवैये से यूनिवर्सिटी का नाम बदल दिया, जबकि लखनऊ में पहले से King George Medical College मौजूद है। उन्होंने इसे “जातिवादी और दुर्भावनापूर्ण निर्णय” करार दिया।

    उन्होंने बीजेपी पर भी निशाना साधते हुए कहा कि “बीजेपी सरकार ने अब तक इस गलती को सुधारने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया है”

    शाहूजी की विरासत को बहाल करें: मायावती

    मायावती ने जोर देकर कहा कि यदि सरकार सही मायनों में सामाजिक न्याय की बात करती है, तो उसे तत्काल प्रभाव से चट्रपति शाहू जी महाराज मेडिकल यूनिवर्सिटी का नाम बहाल करना चाहिए। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी यह मांग करती रही है और आगे भी करती रहेगी।

    CR PATIL PRAISES MODI: ‘हर तबके को मिला सम्मान’, सीआर पाटिल बोले- मोदी युग में बदला भारत का चेहरा

  • CJI Gavai on Constitution: “संसद नहीं, संविधान सर्वोच्च”, अमरावती में बोले CJI गवई

    CJI Gavai on Constitution: “संसद नहीं, संविधान सर्वोच्च”, अमरावती में बोले CJI गवई

    CJI Gavai on Constitution: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई ने देश की लोकतांत्रिक प्रणाली को लेकर एक अहम बयान देते हुए कहा है कि भारत में संसद नहीं, बल्कि संविधान सर्वोच्च है। उन्होंने यह टिप्पणी अमरावती में बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित एक समारोह में की, जो उनका गृह नगर है।

    मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि

    लोकतंत्र के तीनों स्तंभ - कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका - संविधान के अधीन हैं, और कोई भी अंग संविधान से ऊपर नहीं है। CJI गवई ने कहा कि कई बार यह भ्रम फैलाया जाता है कि संसद सर्वोच्च है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि भारत का संविधान ही सर्वोच्च दस्तावेज है। CJI Gavai on Constitution

    उन्होंने कहा कि किसी न्यायाधीश का सरकार के खिलाफ फैसला देना ही यह सिद्ध नहीं करता कि वह स्वतंत्र है। एक न्यायाधीश को हर समय यह याद रखना चाहिए कि उसकी भूमिका सिर्फ फैसले देने की नहीं, बल्कि मौलिक अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों के रक्षक के रूप में भी है। CJI Gavai on Constitution

    संविधान की मूल संरचना अटल है- CJI Gavai on Constitution

    CJI गवई ने कहा कि भले ही संसद को संविधान में संशोधन करने का अधिकार हो, लेकिन वह संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) को नहीं बदल सकती। यह बात सुप्रीम कोर्ट पहले भी अपने ऐतिहासिक फैसलों में स्पष्ट कर चुका है। इस मूल ढांचे में लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, मौलिक अधिकार और न्यायपालिका की स्वतंत्रता जैसे सिद्धांत शामिल हैं।

    “बुलडोजर जस्टिस” पर दोहराया आवास अधिकार- CJI Gavai on Constitution

    मुख्य न्यायाधीश ने अपने चर्चित फैसले की ओर इशारा करते हुए कहा कि उन्होंने “बुलडोजर जस्टिस” मामले में आवास को मौलिक अधिकार माना था। उन्होंने कहा, “मैं हमेशा संविधान के साथ खड़ा रहा हूं और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की है।”

    न्यायिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक राय

    CJI गवई ने यह भी कहा कि न्यायाधीशों को यह सोचकर निर्णय नहीं लेना चाहिए कि जनता उनके फैसलों के बारे में क्या सोचेगी या कहेगी। उन्होंने दो टूक कहा, “फैसले संविधान के अनुसार लिए जाने चाहिए, न कि भीड़ या सोशल मीडिया के प्रभाव में।”

    निजी जीवन की झलक: क्यों बने वकील?

    इस समारोह में CJI गवई भावुक भी हो गए। उन्होंने बताया कि वह आर्किटेक्ट बनना चाहते थे, लेकिन उनके पिता चाहते थे कि वे वकील बनें। उनके पिता स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण वकील नहीं बन पाए थे, और उनकी यह इच्छा गवई ने पूरी की।

    मुख्य न्यायाधीश का यह बयान उस समय आया है जब देश में बार-बार संसद की सर्वोच्चता की चर्चा होती है। ऐसे समय में उनका यह दो टूक कहना कि संविधान ही सर्वोच्च है, लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण संदेश है। यह बयान न सिर्फ संवैधानिक मूल्यों को रेखांकित करता है, बल्कि न्यायपालिका की भूमिका को भी मजबूती से सामने रखता है। CJI Gavai on Constitution

    50 years of Emergency: 1975 की इमरजेंसी; पांच बदलाव जो बन गए भारतीय राजनीति के टर्निंग पॉइंट

    IND vs ENG 2025: लीड्स टेस्ट में भारत की हार, शुभमन गिल की कप्तानी पर उठे सवाल

    PF withdrawal via ATM: अब ATM और UPI से निकलेगा PF का पैसा, जानें नई सुविधा से जुड़ी हर जरूरी बात

  • Kanpur Dehat News: कानपुर देहात में पति को सताया हत्या का डर! प्रेमी से कराई पत्नी की शादी

    Kanpur Dehat News: कानपुर देहात में पति को सताया हत्या का डर! प्रेमी से कराई पत्नी की शादी

    Kanpur Dehat News: सोचिए क्या हो जब एक पति खुद ही अपनी पत्नी की शादी उसके प्रेमी से करवा दे? जी हां, यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि हकीकत है जो कानपुर देहात के रसूलाबाद कोतवाली के भग्गा निवादा गांव में घटी। इस मामले में योगेश तिवारी नामक युवक ने अपनी पत्नी सोनी की शादी उसके प्रेमी विकास से स्वयं करवा दी, वो भी गांव के मंदिर में पूरे रीति-रिवाज़ से। Kanpur Dehat News

    2010 में हुई थी शादी, फिर रिश्ते में आई दरार– Kanpur Dehat News

    योगेश तिवारी की शादी 2010 में बिल्हौर कोतवाली के सांभी गांव की निवासी सोनी से हुई थी। शुरूआत में सब सामान्य था, लेकिन कुछ ही वर्षों में उनके रिश्ते में कड़वाहट आने लगी। आए दिन झगड़े होने लगे। 2016 में सोनी ने योगेश पर दहेज उत्पीड़न का मुकदमा भी दर्ज कराया, जिसके बाद से उनके बीच का तनाव और गहरा हो गया।

    गायब रहने लगी पत्नी, मिली जान से मारने की धमकी– Kanpur Dehat News

    शिकायत दर्ज होने के बाद सोनी अक्सर गांव से गायब रहने लगी और जब भी योगेश सवाल करता, वह उसे जान से मारने की धमकी देती। योगेश का कहना है कि कई बार उसने डर के चलते चुप रहना ही बेहतर समझा।

    डेढ़ महीने पहले छोड़ गई घर, फिर लौटी प्रेमी संग– Kanpur Dehat News

    करीब डेढ़ माह पूर्व सोनी घर छोड़ कर चली गई थी। 25 जून को वह अपने प्रेमी विकास के साथ गांव लौट आई और पति योगेश से कहने लगी कि वह अब विकास से शादी करके उसी के साथ रहेगी। यह सुनकर योगेश के होश उड़ गए।

    योगेश पहुंचा पुलिस चौकी, पुलिस ने जताई असमर्थता

    डर के साए में जी रहे योगेश ने तत्काल चिस्ती पुलिस चौकी पहुंचकर पूरी कहानी बताई और अपील की कि सोनी की शादी उसके प्रेमी से करवा दी जाए। लेकिन पुलिस ने इस पर अपनी असमर्थता जताई।

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    माता-पिता की सहमति से करवा दी पत्नी की शादी

    पुलिस से निराश होकर योगेश वापस गांव आया और अपने माता-पिता से विचार-विमर्श किया। अंततः उसने गांव वालों के सामने लिखित सहमति पत्र तैयार करवाया और गांव के मंदिर में सोनी और विकास की शादी करवा दी। शादी के बाद सोनी विकास के साथ चली गई।

    हत्या का डर बना कारण

    योगेश का मानना है कि मेरठ, इंदौर, और औरैया जैसे कई शहरों में ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, जहां पत्नी ने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी। इसी डर के चलते योगेश ने यह चौंकाने वाला कदम उठाया। उसका मानना है कि यदि उसने ऐसा नहीं किया होता, तो शायद वह अपनी जान से हाथ धो बैठता।

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    ग्राम प्रधान की राय

    गांव के ग्राम प्रधान जयचंद्र ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह बेहद असामान्य स्थिति थी, लेकिन योगेश ने समझदारी और साहस का परिचय दिया है।

    • योगेश तिवारी (पति):
    "मैं जान से डर गया था, कहीं सोनी और विकास मेरी हत्या न कर दें। इसलिए मैंने खुद ही उनकी शादी करवा दी।"
    • जयचंद्र (ग्राम प्रधान):
    "गांव में ऐसा मामला पहली बार देखा। लेकिन जो हुआ, वह सोच-समझकर ही किया गया।"
  • IND vs ENG 2025: लीड्स टेस्ट में भारत की हार, शुभमन गिल की कप्तानी पर उठे सवाल

    IND vs ENG 2025: लीड्स टेस्ट में भारत की हार, शुभमन गिल की कप्तानी पर उठे सवाल

    IND vs ENG 2025: भारतीय क्रिकेट टीम को इंग्लैंड के खिलाफ लीड्स टेस्ट में 5 विकेट से हार का सामना करना पड़ा। यह मुकाबला भारत आसानी से जीत सकता था, लेकिन खराब फील्डिंग, अति उत्साह, औसत कप्तानी और निचले क्रम के बल्लेबाजों के निराशाजनक प्रदर्शन ने टीम की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। इस हार के साथ भारत पांच मैचों की टेस्ट सीरीज में 0-1 से पीछे हो गया है। अब सभी की निगाहें 2 जुलाई से एजबेस्टन में होने वाले अगले मुकाबले पर टिकी हैं। आइए, इस हार के कारणों और इससे निकलने वाली पांच मुख्य बातों पर नजर डालते हैं।

    रोहित-कोहली की अनुपस्थिति का असर- IND vs ENG 2025

    यह भारत का पहला टेस्ट था, जब रोहित शर्मा और विराट कोहली टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले चुके थे। बल्लेबाजी में उनकी कमी शायद उतनी नहीं खली, लेकिन फील्डिंग में खासकर कोहली की गैरमौजूदगी साफ दिखी। कोहली की स्लिप में चुस्ती और खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाने की क्षमता भारतीय टीम को बहुत याद आई। नए कप्तान शुभमन गिल के लिए यह पहला टेस्ट था, और अनुभव की कमी ने उनकी कप्तानी को प्रभावित किया। IND vs ENG 2025

    1. बुमराह पर अत्यधिक निर्भरता- IND vs ENG 2025

    जसप्रीत बुमराह ने एक बार फिर साबित किया कि वह भारतीय गेंदबाजी के रीढ़ हैं। पहली पारी में उनके पांच विकेट ने भारत को 6 रनों की मामूली बढ़त दिलाई। हालांकि, दूसरी पारी में बुमराह का जादू नहीं चला, और बाकी गेंदबाज दबाव नहीं बना सके। यह हार दर्शाती है कि भारत की जीत की उम्मीदें काफी हद तक बुमराह पर टिकी थीं। यह रणनीति लंबे समय तक कारगर नहीं हो सकती। अन्य गेंदबाजों, जैसे मोहम्मद सिराज और शार्दूल ठाकुर, को भी जिम्मेदारी उठानी होगी। IND vs ENG 2025

    2. शुभमन गिल की औसत कप्तानी- IND vs ENG 2025

    शुभमन गिल ने बल्ले से शानदार शतक जड़ा, लेकिन कप्तान के तौर पर वह प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहे। नाजुक मौकों पर उनकी रणनीति में स्पष्टता की कमी दिखी। गेंदबाजों का रोटेशन सही नहीं था, और फील्ड प्लेसमेंट भी रक्षात्मक रही। इंग्लैंड के बल्लेबाजों ने आखिरी दिन तेजी से रन बनाए, लेकिन गिल उन्हें रोकने के लिए कोई ठोस योजना नहीं बना सके। अनुभव के साथ उनकी कप्तानी में सुधार की उम्मीद है।

    3. शतकों का ढेर, फिर भी हार- IND vs ENG 2025

    भारतीय बल्लेबाजों ने इस मैच में पांच शतक जड़े। ऋषभ पंत ने दोनों पारियों में शतक ठोके, जबकि शुभमन गिल, यशस्वी जायसवाल, और केएल राहुल ने भी सैकड़े बनाए। व्यक्तिगत उपलब्धियां हासिल करना अच्छा है, लेकिन जब टीम हार जाए तो इनका महत्व फीका पड़ जाता है। निचले क्रम के बल्लेबाजों ने निराश किया, जिसके कारण भारत दूसरी पारी में बड़ा स्कोर नहीं बना सका।

    4. जीत की भूख का अभाव- IND vs ENG 2025

    मैच के आखिरी दिन इंग्लैंड ने तेजी से रन बनाकर मुकाबला अपने पक्ष में कर लिया। इस दौरान भारतीय खिलाड़ियों की बॉडी लैंग्वेज में निराशा और थकान साफ दिखी। फील्डिंग में सुस्ती, रणनीति में भ्रम, और जीत की चाह का अभाव भारत की हार का प्रमुख कारण बना। कोहली जैसे सीनियर खिलाड़ी होते तो शायद टीम में जोश और जुनून देखने को मिलता।

    5. संतुलित टीम की जरूरत- IND vs ENG 2025

    लीड्स टेस्ट ने दिखाया कि टैलेंट के साथ-साथ अनुभव और मानसिक मजबूती भी जरूरी है। भारत को अगले मुकाबले के लिए गेम प्लान और टीम चयन पर ध्यान देना होगा। अर्शदीप सिंह को बाएं हाथ के तेज गेंदबाज के तौर पर मौका देना फायदेमंद हो सकता है। साथ ही, कुलदीप यादव जैसे चाइनामैन गेंदबाज को शामिल करने पर विचार करना चाहिए, जो किसी भी पिच पर प्रभावी हो सकते हैं।

    यह हार भारतीय टीम के लिए एक सबक है। एजबेस्टन टेस्ट में भारत को अपनी गलतियों से सीखकर वापसी करनी होगी। शुभमन गिल को कप्तानी में सुधार करना होगा, और बाकी खिलाड़ियों को सामूहिक जिम्मेदारी लेनी होगी। बुमराह के साथ-साथ अन्य गेंदबाजों को भी आगे आना होगा। फील्डिंग में सुधार और निचले क्रम की बल्लेबाजी को मजबूत करना जरूरी है।

    लीड्स टेस्ट में भारत की हार ने कई सवाल खड़े किए हैं। शुभमन गिल की कप्तानी, खराब फील्डिंग, और रणनीति की कमी इस हार के प्रमुख कारण रहे। हालांकि, यह सीरीज का पहला मुकाबला था, और भारत के पास वापसी का मौका है। युवा खिलाड़ियों को अनुभवी खिलाड़ियों की कमी को पूरा करना होगा। क्या भारत एजबेस्टन में जोरदार वापसी करेगा? यह देखना रोमांचक होगा। IND vs ENG 2025

    SOURCE- TIMES OF INDIA

  • 50 years of Emergency: 1975 की इमरजेंसी; पांच बदलाव जो बन गए भारतीय राजनीति के टर्निंग पॉइंट

    50 years of Emergency: 1975 की इमरजेंसी; पांच बदलाव जो बन गए भारतीय राजनीति के टर्निंग पॉइंट

    लेखक- संदीप कुमार (मैनेजिंग एडिटर)

    50 years of Emergency: 25 जून 1975 की वह रात भारतीय इतिहास में एक काले अध्याय की शुरुआत थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आधी रात को देश में आपातकाल (इमरजेंसी) लागू करने का ऐलान किया। यह निर्णय न केवल भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ा झटका था, बल्कि इसने देश की सियासत को भी नए रंगों में रंग दिया। इमरजेंसी के दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हुआ, हजारों लोग जेलों में बंद किए गए, और प्रेस की आजादी पर ताला लग गया। लेकिन इसके बावजूद, इस दौर ने भारतीय राजनीति में कई ऐतिहासिक बदलावों को जन्म दिया। आइए, इमरजेंसी के 50 साल पूरे होने पर इसके पांच बड़े सियासी प्रभावों पर नजर डालें। 50 years of Emergency

    1. जयप्रकाश नारायण: एक नए नेतृत्व का उदय- 50 years of Emergency

    आजादी के बाद से भारतीय राजनीति में कांग्रेस का वर्चस्व निर्विवाद था। पंडित जवाहरलाल नेहरू और फिर इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने केंद्र और राज्यों में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी। लेकिन इमरजेंसी ने इस एकछत्र राज को चुनौती दी। इस दौर में जयप्रकाश नारायण, जिन्हें ‘लोकनायक’ के नाम से जाना जाता है, एक नए नेतृत्व के रूप में उभरे। 50 years of Emergency

    जेपी, जैसा कि उन्हें प्यार से बुलाया जाता था, ने इमरजेंसी के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन शुरू किया। उनका ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा युवाओं और आम जनता के बीच गूंजने लगा। इस आंदोलन ने न केवल इंदिरा गांधी के नेतृत्व को चुनौती दी, बल्कि भारतीय सियासत को नए चेहरों और विचारों से परिचित कराया। जेपी ने साबित किया कि नेतृत्व केवल सत्ता में बैठकर नहीं, बल्कि जनता के बीच रहकर भी किया जा सकता है। 50 years of Emergency

    2. किंगमेकर की परंपरा की शुरुआत- 50 years of Emergency

    इमरजेंसी विरोधी आंदोलन ने भारतीय राजनीति में एक नई परंपरा को जन्म दिया—‘किंगमेकर’ की। जयप्रकाश नारायण उस समय गैर-कांग्रेसी दलों के सबसे बड़े प्रतीक थे। 1977 के आम चुनाव में उन्होंने जनता पार्टी के गठन में अहम भूमिका निभाई, जो विभिन्न विचारधाराओं के दलों का गठजोड़ थी। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि जेपी ने न तो खुद चुनाव लड़ा और न ही सरकार में कोई पद स्वीकार किया। 50 years of Emergency

    जेपी ने किंग की जगह किंगमेकर बनने को प्राथमिकता दी। यह एक ऐसी परंपरा थी, जिसने गठबंधन की सियासत को जन्म दिया। इसके बाद भारतीय राजनीति में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ, जो आज भी देश की सियासत का एक अहम हिस्सा है। 50 years of Emergency

    3. कांग्रेस के एकछत्र राज का अंत- 50 years of Emergency

    आजादी के बाद से 1975 तक, कांग्रेस का भारतीय सियासत पर एकछत्र राज था। केंद्र से लेकर राज्यों तक, कांग्रेस की सरकारें थीं, और इसे चुनौती देना किसी भी दल के लिए असंभव-सा लगता था। लेकिन इमरजेंसी और इसके खिलाफ हुए आंदोलन ने इस मिथक को तोड़ दिया।

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    1977 के आम चुनाव में जनता पार्टी ने कांग्रेस को करारी शिकस्त दी। इंदिरा गांधी स्वयं अपनी रायबरेली सीट हार गईं। इस हार ने कांग्रेस की अजेय छवि को ध्वस्त कर दिया और यह साबित किया कि भारतीय मतदाता सत्ता को बदलने की ताकत रखता है। इसने लोकतंत्र में जनता की ताकत को और मजबूत किया।

    4. जनता परिवार का जन्म और विस्तार- 50 years of Emergency

    इमरजेंसी विरोधी आंदोलन ने विभिन्न विचारधाराओं को एक मंच पर लाने का काम किया। समाजवादी, गांधीवादी, और जनसंघ जैसे अलग-अलग विचारों वाले दल एकजुट हुए और जनता पार्टी का गठन हुआ। 1977 के चुनाव में जनता पार्टी ने 542 में से 298 सीटें जीतकर सरकार बनाई।

    हालांकि, जनता पार्टी की सरकार ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी और दो साल में ही आंतरिक मतभेदों के कारण यह बिखर गई। लेकिन इसने कई नए दलों को जन्म दिया। जनता दल, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड), बीजू जनता दल, और राष्ट्रीय लोक दल जैसे दल इसी जनता परिवार का हिस्सा हैं। यह दौर भारतीय सियासत में बहुदलीय व्यवस्था की नींव साबित हुआ।

    5. बीजेपी का उदय और दिल्ली की सत्ता तक का सफर- 50 years of Emergency

    इमरजेंसी विरोधी आंदोलन ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के उदय की पृष्ठभूमि तैयार की। भारतीय जनसंघ, जो जनता पार्टी का हिस्सा था, ने इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन जनता पार्टी में आंतरिक मतभेदों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं ने 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की।

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    बीजेपी ने अपनी शुरुआत दो सीटों के साथ की थी, लेकिन धीरे-धीरे यह पार्टी भारतीय सियासत की मुख्यधारा में शामिल हो गई। 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी ने पहली बार केंद्र में सरकार बनाई, भले ही वह केवल 13 दिनों तक चली। इसके बाद 1998 और 1999 में बीजेपी ने पूर्णकालिक सरकारें बनाईं, और 2014 से यह पार्टी लगातार केंद्र की सत्ता पर काबिज है।

    इमरजेंसी का दीर्घकालिक प्रभाव- 50 years of Emergency

    इमरजेंसी का दौर भारतीय लोकतंत्र के लिए एक कठिन परीक्षा थी, लेकिन इसने कई सबक भी सिखाए। इसने जनता में लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा की और सत्ता के विकेंद्रीकरण को बढ़ावा दिया। इमरजेंसी ने यह भी साबित किया कि भारतीय मतदाता अपनी ताकत को पहचानता है और वह सत्ता को बदलने की हिम्मत रखता है।\

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    आज जब हम इमरजेंसी के 50 साल पूरे होने की बात करते हैं, तो यह याद रखना जरूरी है कि यह दौर न केवल एक संकट था, बल्कि भारतीय सियासत को नई दिशा देने वाला एक ऐतिहासिक मोड़ भी था। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व से लेकर बीजेपी के उभार तक, इमरजेंसी ने भारतीय राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया।

    इमरजेंसी का दौर भारतीय इतिहास का एक ऐसा अध्याय है, जिसने न केवल सियासत को बदला, बल्कि लोकतंत्र को और मजबूत करने में भी योगदान दिया। इसने सत्ता के एकध्रुवीय स्वरूप को तोड़ा और बहुदलीय व्यवस्था को जन्म दिया। आज, जब हम इमरजेंसी के 50 साल पूरे होने पर पीछे मुड़कर देखते हैं, तो यह स्पष्ट है कि यह दौर भारतीय सियासत के लिए एक टर्निंग पॉइंट था, जिसने देश को नए नेतृत्व, नई परंपराओं, और नए दलों से परिचित कराया।

    सोर्स- AAJ TAK

  • Sonbhadra murder case: सोनभद्र में अमरनाथ यादव हत्याकांड का खुलासा; पुरानी रंजिश में रची गई थी साजिश, तीन आरोपी गिरफ्तार

    Sonbhadra murder case: सोनभद्र में अमरनाथ यादव हत्याकांड का खुलासा; पुरानी रंजिश में रची गई थी साजिश, तीन आरोपी गिरफ्तार

    सोनभद्र। संवाददाता – मनोज कुमार
    Sonbhadra murder case: उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के शाहगंज थाना क्षेत्र अंतर्गत मराची गांव में हुई गोलीकांड की गुत्थी को पुलिस ने सुलझा लिया है। गत 17 जून की रात हुए अमरनाथ यादव हत्याकांड का पुलिस ने आज खुलासा करते हुए तीन नामजद आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। पुरानी रंजिश और पारिवारिक दुश्मनी इस निर्मम हत्या की वजह बनी। पुलिस ने आरोपियों के पास से अवैध हथियार भी बरामद किए हैं।

    अपर पुलिस अधीक्षक (नक्सल) त्रिभुवन नाथ त्रिपाठी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि मराची गांव निवासी 55 वर्षीय अमरनाथ यादव की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में मृतक के पुत्र अनिल यादव की तहरीर पर दो नामजद सहित तीन के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। पुलिस अधीक्षक अशोक कुमार मीणा के निर्देश पर तीन टीमें गठित की गईं थीं। आज सुबह मुखबिर की सूचना पर एसओजी व शाहगंज पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में ओमजी पाठक, मंगला गुप्ता और अन्तलाल गुप्ता को प्रा. विद्यालय उमरी के पास से बाइक सहित गिरफ्तार किया गया।

    तीनों आरोपी अदालत में पेश होने की तैयारी में थे। पुलिस के डर से मुख्य सड़क की बजाय वैकल्पिक रास्ते से जा रहे थे, तभी गिरफ्त में आ गए। पूछताछ में आरोपियों ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं।

    हत्या की वजह बना पुराना विवाद– Sonbhadra murder case

    गिरफ्तार अभियुक्त मंगला प्रसाद गुप्ता ने बताया कि अमरनाथ यादव ने वर्ष 2023 में उसके माता-पिता के साथ मारपीट की थी, जिससे उसके पिता का हाथ टूट गया था। इस घटना के बाद उनका परिवार मजबूरी में पैतृक संपत्ति बेचकर लालगंज (मीरजापुर) चला गया और फिर सूरत में नौकरी करने लगा। मंगला ने बताया कि अपमान और तकलीफ से आहत होकर उसने अमरनाथ को मारने की योजना बनाई।

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    रची गई साजिश, अंजाम दिया गया मर्डर– Sonbhadra murder case

    मंगला ने अपने दो मित्रों – ओमजी पाठक और अन्तलाल गुप्ता – को इस योजना में शामिल किया। 17 जून की रात तीनों आरोपी बाइक से मराची गांव पहुंचे। अमरनाथ अपने घर के बाहर मच्छरदानी के अंदर सो रहे थे। मंगला और ओमजी दोनों तमंचे लेकर पहुंचे, जबकि अन्तलाल बाइक के पास निगरानी कर रहा था। मंगला ने अमरनाथ के सिर में गोली मार दी। आवाज सुनकर घरवाले जागे तो ओमजी ने भी फायर किया और तमंचा वहीं छोड़कर भाग निकले।Sonbhadra murder case

    तीनों आरोपी मीरजापुर भाग गए और अलग-अलग जगहों पर छिपे रहे। कोर्ट में पेशी के लिए आज जा रहे थे कि पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया। तलाशी में एक देसी तमंचा और एक खाली कारतूस बरामद किया गया। Sonbhadra murder case

    पुलिस की तत्परता से खुला राज– Sonbhadra murder case

    तीनों आरोपियों की गिरफ्तारी में एसओजी टीम और शाहगंज पुलिस की भूमिका महत्वपूर्ण रही। पुलिस ने यह सफलता मुखबिर की सूचना और तकनीकी सर्विलांस के जरिए हासिल की। पुलिस अब आरोपियों से घटना में प्रयुक्त अन्य हथियार और साजिश से जुड़े सबूत इकट्ठा कर रही है।

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  • Railway Fare May Hike: 1 जुलाई से बदल सकते हैं ट्रेन टिकटों के दाम, लंबी दूरी की यात्रा होगी महंगी!

    Railway Fare May Hike: 1 जुलाई से बदल सकते हैं ट्रेन टिकटों के दाम, लंबी दूरी की यात्रा होगी महंगी!

    Railway Fare May Hike: रेलवे से यात्रा करने वाले लाखों यात्रियों को जल्द ही झटका लग सकता है। भारतीय रेलवे 1 जुलाई 2025 से नई फेयर पॉलिसी लागू करने की योजना बना रहा है, जिसके तहत एसी और नॉन एसी कोच के किराए में प्रति किलोमीटर दर के हिसाब से इजाफा किया जाएगा। यह प्रस्ताव रेलवे बोर्ड द्वारा तैयार कर रेल मंत्रालय को भेजा गया है और अंतिम मंजूरी के बाद इसे लागू किया जाएगा।

    क्या है प्रस्तावित बदलाव?

    नई फेयर पॉलिसी के तहत:

    • नॉन एसी मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों में सफर करने वाले यात्रियों को प्रति किलोमीटर 1 पैसा अधिक देना होगा।
    • वहीं एसी कोच में यात्रा करने वालों को 2 पैसे प्रति किलोमीटर का अतिरिक्त शुल्क देना पड़ सकता है।
    • सेकेंड क्लास यात्रियों को 500 किमी से अधिक की दूरी पर आधा पैसा प्रति किलोमीटर की दर से किराया देना होगा।

    500 किलोमीटर से ज्यादा सफर करने वालों पर असर

    यह बदलाव सिर्फ लंबी दूरी की यात्रा (500 किमी से अधिक) पर लागू होगा। इसका मतलब है कि रोजाना के लोकल यात्रियों या कम दूरी पर सफर करने वालों पर इस बदलाव का कोई असर नहीं पड़ेगा। यह बढ़ोतरी मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों के एसी और नॉन एसी डिब्बों तक ही सीमित रहेगी।

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    कम दूरी की यात्रा अब भी किफायती

    रेलवे ने स्पष्ट किया है कि 500 किलोमीटर तक की यात्रा करने वालों के टिकट की दरों में कोई बदलाव नहीं होगा। इस बदलाव का उद्देश्य राजस्व बढ़ाना है, लेकिन आम यात्रियों पर न्यूनतम प्रभाव डालने की कोशिश की गई है।

    https://nationnowsamachar.com/national/india-nuclear-weapons-bharat-parmanu-shakti-pakistan-chin-takkar/

    किराया कितना बढ़ेगा?

    आइए एक उदाहरण से समझते हैं –
    अगर आप 600 किलोमीटर का सफर करते हैं:

    • नॉन एसी मेल/एक्सप्रेस ट्रेन में: 600×1 पैसा = ₹6 का अतिरिक्त खर्च
    • एसी कोच में: 600×2 पैसा = ₹12 का अतिरिक्त खर्च

    हालांकि यह वृद्धि मामूली लग सकती है, लेकिन भारी संख्या में यात्रा करने वाले यात्रियों के हिसाब से यह रेलवे के राजस्व में उल्लेखनीय बढ़ोतरी ला सकती है।

    रेल मंत्रालय की मुहर बाकी

    यह पूरा प्रस्ताव फिलहाल रेल मंत्रालय की मंजूरी का इंतजार कर रहा है। एक बार स्वीकृति मिल जाने पर यह नई दरें 1 जुलाई 2025 से देशभर में लागू कर दी जाएंगी। मंत्रालय का कहना है कि नई नीति पारदर्शी और संतुलित होगी।

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  • Panchayat Season 4 Review: सत्ता की कुर्सी के लिए फुलेरा में छिड़ी सियासी जंग, मंजू देवी बनाम क्रांति देवी की दिलचस्प टक्कर!

    Panchayat Season 4 Review: सत्ता की कुर्सी के लिए फुलेरा में छिड़ी सियासी जंग, मंजू देवी बनाम क्रांति देवी की दिलचस्प टक्कर!

    Panchayat Season 4 Review: 2020 में जब देश कोरोना की मार झेल रहा था, तब अमेजन प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई वेब सीरीज पंचायत ने हर घर में अपनी जगह बनाई। इस सीरीज की सादगी, देसी ह्यूमर, और फुलेरा गांव की कहानियां दर्शकों के लिए एक कम्फर्ट जोन बन गईं। अब, पंचायत सीजन 4 के साथ फुलेरा की मंडली एक बार फिर लौट आई है, और इस बार कहानी में है तगड़ा पॉलिटिकल ड्रामा और हल्की-फुल्की हंसी का तड़का। लेकिन क्या ये सीजन पहले की तरह दिल जीत पाया? आइए, इस रिव्यू में जानते हैं।

    कहानी: फुलेरा में चुनावी बुखार- Panchayat Season 4 Review

    पंचायत सीजन 4 की कहानी वहीं से शुरू होती है, जहां सीजन 3 ने अलविदा कहा था। प्रधानजी (रघुबीर यादव) पर गोली चली थी, जो उनके कंधे को चोटिल कर गई। अब जख्म तो भर चुका है, लेकिन उनके मन में डर और दर्द अभी भी जिंदा है। दूसरी ओर, सचिव जी यानी अभिषेक त्रिपाठी (जितेंद्र कुमार) पर विधायक (प्रकाश झा) से मारपीट का केस दर्ज हो चुका है। साथ ही, वे अपने CAT एग्जाम के रिजल्ट का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन फुलेरा गांव में सबसे बड़ा ट्विस्ट है पंचायत चुनाव, जहां मंजू देवी (नीना गुप्ता) की प्रधानी की कुर्सी खतरे में है। Panchayat Season 4 Review

    इस बार मंजू देवी का मुकाबला है बनराकस (दुर्गेश कुमार) की पत्नी क्रांति देवी (सुनीता राजवार) से। क्रांति और बनराकस की जोड़ी, बिनोद (अशोक पाठक) और माधव (बुल्लू कुमार) के साथ मिलकर, मंजू देवी और उनकी टीम को कड़ी टक्कर दे रही है। विधायक भी इस विपक्षी खेमे का खुलकर समर्थन कर रहा है। दूसरी ओर, प्रधानजी और उनकी टीम को कोई अनजान शुभचिंतक मदद कर रहा है, जिसका राज अभी छिपा हुआ है। क्या मंजू देवी अपनी गद्दी बचा पाएंगी? या क्रांति देवी फुलेरा की नई प्रधान बनेंगी? ये सवाल आपको आखिरी एपिसोड तक बांधे रखते हैं। Panchayat Season 4 Review

    क्या है खास?- Panchayat Season 4 Review

    पंचायत सीजन 4 की सबसे बड़ी ताकत है इसका देसी ह्यूमर और गांव की सादगी। मंजू देवी और क्रांति के बीच की नोंक-झोंक, बनराकस की चालबाजियां, और बिनोद की बेवकूफियां दर्शकों को हंसी के ठहाके लगाने पर मजबूर करती हैं। खासकर बिनोद का किरदार इस सीजन में कमाल का है। अशोक पाठक ने आखिरी एपिसोड में बिनोद के इमोशन्स को इतने शानदार ढंग से दिखाया है कि आप उनकी मासूमियत और मजबूरी दोनों को महसूस करते हैं।

    चुनावी ड्रामा भी इस सीजन का हाईलाइट है। गांव की पॉलिटिक्स, वोट की खींचतान, और चालबाजियां आपको भारतीय ग्रामीण राजनीति की एक मजेदार झलक देती हैं। साथ ही, किरदारों की एक्टिंग इस सीजन को और रंगीन बनाती है। नीना गुप्ता मंजू देवी के रोल में उतनी ही दमदार हैं, जितनी पहले थीं। रघुबीर यादव का प्रधानजी का किरदार आपको इमोशनल कर देता है, और जितेंद्र कुमार सचिव जी के रूप में फिर से दिल जीत लेते हैं।

    कहां रह गई कमी?- Panchayat Season 4 Review

    हालांकि पंचायत सीजन 4 मनोरंजन से भरा है, लेकिन यह सीजन 3 की तरह थोड़ा उथला लगता है। कहानी ज्यादातर चुनाव और पॉलिटिक्स के इर्द-गिर्द ही घूमती है, जिसके बाद कुछ नया देखने को नहीं मिलता। सचिव जी और रिंकी (सांविका) की प्रेम कहानी, जिसका फैंस को बेसब्री से इंतजार था, इस बार भी ज्यादा आगे नहीं बढ़ी। दोनों का रोमांस पिछले सीजन से बस एक कदम आगे है, जो थोड़ा निराश करता है।

    इसके अलावा, कुछ नए किरदारों को कहानी में शामिल किया गया है, लेकिन उनकी मौजूदगी बस कुछ पलों तक ही सीमित है। इन किरदारों को और गहराई दी जा सकती थी। साथ ही, प्रधानजी पर गोली चलाने का रहस्य इस सीजन में सुलझ तो जाता है, लेकिन उसका जवाब उतना संतोषजनक नहीं लगता। कहानी का पैटर्न कुछ जगहों पर प्रेडिक्टेबल भी हो जाता है, जो सीरीज की ताजगी को थोड़ा कम करता है।

    एक्टिंग और टेक्निकल पक्ष- Panchayat Season 4 Review

    पंचायत की कास्ट हमेशा से इसकी जान रही है, और इस बार भी सभी ने अपने किरदारों को बखूबी निभाया है। दुर्गेश कुमार का बनराकस आपको गुस्सा भी दिलाता है और हंसाता भी है। सुनीता राजवार क्रांति देवी के किरदार में जंचती हैं, और फैसल मलिक का प्रह्लाद चा फिर से दिल छू लेता है। चंदन रॉय (विकास) और सांविका (रिंकी) अपने रोल में सहज और प्यारे लगते हैं।

    टेक्निकल पक्ष की बात करें तो, मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में शूटिंग ने फुलेरा गांव को जीवंत बनाया है। अनुराग सैकिया का बैकग्राउंड म्यूजिक कहानी के मूड को और गहरा करता है। सिनेमटोग्राफी और एडिटिंग भी साफ-सुथरी है, जो सीरीज को एक रियलिस्टिक टच देती है।

    क्या देखें? Panchayat Season 4 Review

    अगर आप पंचायत के फैन हैं और फुलेरा गांव की सादगी, हंसी, और पॉलिटिक्स का मजा लेना चाहते हैं, तो पंचायत सीजन 4 आपके लिए है। ये सीजन भले ही पहले दो सीजनों जितना तगड़ा न हो, लेकिन फिर भी ये एक पारिवारिक शो है, जिसे आप अपने पूरे परिवार के साथ बैठकर देख सकते हैं। मंजू देवी और क्रांति देवी की जंग, बनराकस की हरकतें, और बिनोद की मासूमियत आपको हंसाने और सोचने पर मजबूर करेंगी।

    रेटिंग: 3.5/5

    पंचायत सीजन 4 एक मजेदार और इमोशनल राइड है, जो थोड़ा और गहरा हो सकता था। फिर भी, फुलेरा की ये कहानी आपके चेहरे पर मुस्कान जरूर लाएगी।

    सोर्स- indianexpress