संवाददाता प्रवीण कुमार मिश्रा उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने बुंदेलखंड की पारंपरिक सामाजिक सोच को नई दिशा देने का काम किया है। आमतौर पर इस क्षेत्र में आज भी बेटा-बेटी के बीच भेदभाव देखने को मिलता है, लेकिन मौदहा कस्बे के फत्तेपुर मोहल्ले में 40 साल बाद बेटी के जन्म पर जिस तरह खुशियां मनाई गईं, उसने समाज के सामने एक सकारात्मक उदाहरण पेश किया है।

फत्तेपुर निवासी अंजुम परवेज उर्फ राजू और उनकी पत्नी निकहत फातिमा के घर नवजात बेटी के जन्म के बाद पूरा परिवार जश्न में डूब गया। बेटी को अस्पताल से घर लाने के लिए डीजे, ढोल-नगाड़ों और 12 स्कॉर्पियो गाड़ियों का काफिला निकाला गया। परिवार के सदस्य और मोहल्ले के लोग नाचते-गाते नवजात को घर लेकर पहुंचे। इस दृश्य ने पूरे इलाके का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

बुंदेलखंड क्षेत्र खेती और मजदूरी पर निर्भर है और यहां लंबे समय से बेटे को वंश का सहारा मानने की सोच हावी रही है। ऐसे माहौल में बेटी के जन्म पर इस तरह का सार्वजनिक उत्सव सामाजिक बदलाव की दिशा में एक मजबूत संदेश देता है। यह आयोजन साफ तौर पर बताता है कि बेटियां बोझ नहीं, बल्कि परिवार और समाज के लिए खुशियों की वजह होती हैं।
बेटी के पिता अंजुम परवेज उर्फ राजू ने भावुक होते हुए कहा,“बेटियां अल्लाह की रहमत होती हैं। हमारे परिवार में लंबे समय से कोई संतान नहीं थी। अल्लाह ने 40 साल बाद हमें बेटी से नवाजा है, इसलिए खुशियां मनाना तो बनता है।”
इस मामले पर डॉक्टर अंशु मिश्रा ने बताया कि बीते तीन वर्षों में हमीरपुर जिले में यह पहला मामला है, जब बेटी के जन्म पर इस तरह सार्वजनिक रूप से भव्य जश्न मनाया गया है। उन्होंने कहा कि ऐसी पहल समाज की सोच बदलने में अहम भूमिका निभा सकती है और अन्य परिवारों को भी प्रेरित कर सकती है।
बेटी के जन्म पर मनाई गई यह खुशी केवल एक परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए प्रेरणादायक संदेश है। यह घटना साबित करती है कि सामाजिक सोच धीरे-धीरे बदल रही है और बेटियों को समान सम्मान देने की दिशा में समाज आगे बढ़ रहा है।











