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  • कानपुर देहात के अकबरपुर में करवा चौथ की खरीदारी में रौनक

    कानपुर देहात के अकबरपुर में करवा चौथ की खरीदारी में रौनक

    कानपुर देहात, अकबरपुर:कानपुर देहात में करवा चौथ का पर्व नजदीक आते ही बाजारों में रौनक बढ़ गई है। शहर के प्रमुख बाजारों में महिलाओं ने जमकर खरीदारी की, जिससे त्योहार को लेकर खासा उत्साह देखा जा रहा है।

    कानपुर देहात के अकबरपुर , शहर के प्रमुख बाजारों में आज भारी भीड़ देखने को मिली। सुबह से ही महिलाएं करवा चौथ की तैयारियों में जुटी थीं। पारंपरिक परिधानों, साज-सज्जा के सामान और पूजा की थाली से लेकर ब्यूटी पार्लर तक में महिलाओं की लंबी कतारें देखी गईं।

    लाल-गुलाबी रंग की चूड़ियाँ, मेंहदी, साड़ियों, लहंगों और ज्वेलरी की दुकानों पर जबरदस्त बिक्री दर्ज की गई। दुकानदारों ने बताया कि इस बार बिक्री में पिछले साल की तुलना में अच्छी बढ़ोतरी देखी जा रही है।पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, करवा चौथ का व्रत सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए रखती हैं। इस दिन महिलाएं निर्जल उपवास करती हैं और शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं।बाजारों की चकाचौंध और लोगों का उत्साह यह दर्शाता है कि आधुनिकता के इस दौर में भी हमारी परंपराएं जीवंत हैं।

    संस्कृति और परंपरा का महत्त्व

    करवा चौथ का पर्व केवल व्रत का दिन नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और परंपरा का प्रतीक भी है। इस दिन महिलाएं अपने जीवनसाथी की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए व्रत करती हैं। बाजारों में इस तरह की रौनक इस पर्व के महत्व को और बढ़ा देती है।

  • करवा चौथ 2025: निर्जला व्रत, चंद्र दर्शन और व्रत कथा का महत्व

    करवा चौथ 2025: निर्जला व्रत, चंद्र दर्शन और व्रत कथा का महत्व

    करवा चौथ 2025 -कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ का व्रत किया जाता है। यह व्रत विशेष रूप से सुहागिन महिलाओं के लिए महाव्रत माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि जो महिलाएं इस व्रत को करती हैं, उन्हें अखंड सौभाग्य मिलता है और उनके जीवनसाथी स्वस्थ रहते हैं।

    करवा चौथ निर्जला व्रत है, यानी महिलाएं पूरे दिन जल और अन्न का त्याग करती हैं। व्रत की शुरुआत सुबह सरगी खाने के बाद होती है और दिनभर निर्जल रहकर शाम को चंद्र दर्शन और पूजन के साथ व्रत पूर्ण होता है।

    इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं, विशेषकर लाल रंग को शुभ मानते हुए। घर में शिव-पार्वती, गणेश और करवा माता की पूजा विधिपूर्वक की जाती है। व्रत के दौरान क्रोध से बचना, मन को शांत रखना और दिन में सोने से परहेज करना जरूरी है। जरूरतमंदों को सहायता या सुहाग का सामान दान करना भी शुभ माना जाता है।

    करवा चौथ की कथा

    व्रत कथा वीरावती नाम की महिला से जुड़ी है। पहले व्रत में दिनभर भूखी-प्यासी रहने पर वह बेहोश हो गई। उसके भाई ने झूठा चंद्रमा दिखाकर व्रत तोड़वाया। इस अधूरी निष्ठा के कारण उसके पति की मृत्यु हो गई। वीरावती ने माता से प्रार्थना की और अगली बार विधिपूर्वक व्रत किया, जिससे उसके पति को जीवनदान मिला। कथा यह सिखाती है कि व्रत में छल या अधूरी निष्ठा नहीं होनी चाहिए।इस वर्ष करवा चौथ 2025, 10 अक्टूबर को मनाया जाएगा। व्रत का पालन करते समय सावधानी और स्वास्थ्य का ध्यान रखना आवश्यक है।

  • विजयदशमी के अवसर पर ऐशबाग रामलीला मैदान में रावण दहन देखने पहुंची हजारों की भीड़

    विजयदशमी के अवसर पर ऐशबाग रामलीला मैदान में रावण दहन देखने पहुंची हजारों की भीड़

    लखनऊ में विजयदशमी का पर्व उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया गया। ऐशबाग रामलीला मैदान में आयोजित रामलीला में इस बार 65 फीट ऊंचे रावण के पुतले का भव्य दहन किया गया। जैसे ही प्रभु श्रीराम ने रावण पर बाण चलाया, पूरे मैदान में “जय श्रीराम” के उद्घोष गूंज उठे और आसमान रंग-बिरंगी आतिशबाजी से जगमगा उठा। इस बार रामलीला समिति ने पुतले को इस सोच के साथ जलाया कि विदेशी निर्भरता, नक्सलवाद और जातिवाद जैसी बुराइयों का नाश हो।

    हर साल की तरह इस साल भी रामलीला में हजारों श्रद्धालु और दर्शक शामिल हुए। भीड़ नियंत्रण के लिए प्रशासन और पुलिस ने कड़े इंतज़ाम किए थे। मंच पर रामलीला के पात्रों ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की लीला का अद्भुत मंचन किया, जिसे देखकर दर्शक भावविभोर हो उठे।

    रामलीला के अध्यक्ष हरीश चंद्र अग्रवाल के अनुसार, ऐशबाग की रामलीला सबसे बड़ी और प्रसिद्ध है और यह कई सौ सालों से आयोजित होती आ रही है। रामलीला में बंगाल और स्थानीय 250 से 300 कलाकार भाग लेते हैं। पिछले पांच सालों से समिति केवल रावण के पुतले का दहन करती है, मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतले नहीं जलाए जाते। ऐसा इसलिए क्योंकि मेघनाथ और कुंभकर्ण ने रावण के अहंकार में माता सीता और राम से माफी मांगने की कोशिश की थी, पर रावण वशीभूत और अहंकारी था। मेघनाथ और कुंभकर्ण ने अपने पिता और बड़े भाई की आज्ञा का पालन करते हुए बलिदान दिया। इसीलिए केवल अहंकारी रावण का वध किया जाता है।

    इस भव्य आयोजन ने न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को दर्शाया बल्कि आधुनिक समाज में बुराइयों के खिलाफ संदेश भी दिया। ऐशबाग रामलीला मैदान की यह परंपरा हजारों श्रद्धालुओं के लिए हर साल आकर्षण का केंद्र बनी रहती है।